Sheikh Deen Mohammad: पटना से ब्रिटेन तक, जिन्होंने ‘शैंपू’ शब्द को दुनिया से कराया परिचित

New Delhi: आज जो शैंपू हम रोज इस्तेमाल करते हैं, उसकी कहानी भारत से जुड़ी है। बिहार के पटना में जन्मे शेख दीन मोहम्मद ने 19वीं सदी में भारतीय ‘चंपी’ को ब्रिटेन में लोकप्रिय बनाया, जिससे अंग्रेजी शब्द ‘शैंपू’ अस्तित्व में आया। दीन मोहम्मद का जन्म 1759 में पटना में हुआ था। वे बचपन में ही ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना से जुड़ गए थे और करीब 18 साल सैनिक के रूप में काम करने के बाद यूरोप चले गए। ब्रिटेन का पहला भारतीय रेस्टोरेंट 1810 में Sheikh Deen Mohammad ने लंदन में ‘हिंदुस्तान कॉफी हाउस’ खोला, जिसे ब्रिटेन का पहला भारतीय रेस्टोरेंट माना जाता है। यहां अंग्रेजों को पहली बार भारतीय व्यंजन, हुक्का और भारतीय संस्कृति का स्वाद चखने का मौका मिला। इसके साथ ही वे पहले भारतीय लेखक भी बने, जिनकी किताब अंग्रेजी में प्रकाशित हुई। उन्होंने ‘द ट्रेवल्स ऑफ दीन मोहम्मद’ नाम से किताब लिखी, जिसमें उन्होंने भारत और अपने सफर के अनुभव साझा किए। ये भी पढ़ें:अलास्का की बर्फ में शिफॉन साड़ी: जब माधुरी दीक्षित ठंड से नीली पड़ गईं, अनिल कपूर ने पहनीं 40 जैकेट ‘चंपी’ से बना ‘शैंपू’ 1814 में दीन मोहम्मद ने अपनी पत्नी जेन के साथ इंग्लैंड के ब्राइटन में समुद्र किनारे ‘महोमेद्स बाथ्स’ खोला। यहां वे ग्राहकों को भारतीय जड़ी-बूटियों और खुशबूदार तेलों से चंपी, गर्म पानी का स्नान और भाप स्नान की सुविधा देते थे। भारतीय मालिश परंपरा ‘चंपी’ को उन्होंने अंग्रेजी में ‘शैंपूइंग’ कहा। धीरे-धीरे यही शब्द ‘शैंपू’ बन गया, जो आज बालों की सफाई के लिए इस्तेमाल होने वाले उत्पाद के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। राजा बने उनके ग्राहक दीन मोहम्मद की मालिश और भाप स्नान की तकनीक ब्रिटेन के अमीर वर्ग में इतनी लोकप्रिय हुई कि राजपरिवार तक उनकी पहुंच बन गई। राजा जॉर्ज चतुर्थ और राजा विलियम चतुर्थ ने उन्हें अपना ‘शैंपूइंग सर्जन’ नियुक्त किया। राजा जॉर्ज चतुर्थ ने अपने लिए निजी भाप स्नान भी बनवाया और दीन मोहम्मद को रॉयल वारंट दिया। इससे उनकी पहचान सिर्फ एक व्यवसायी नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के उद्यमी के रूप में बनी। शैंपू का असली आधुनिक रूप यह ध्यान रखना जरूरी है कि दीन मोहम्मद ने आज जैसा लिक्विड शैंपू नहीं बनाया था। उन्होंने भारतीय चंपी और हर्बल तेलों से मालिश की परंपरा को ब्रिटेन में ‘शैंपूइंग’ के नाम से फैलाया था। आधुनिक लिक्विड शैंपू का विकास बाद में यूरोप में हुआ। फिर भी, ‘शैंपू’ शब्द और इसकी वैचारिक जड़ें भारतीय चंपी परंपरा से जुड़ी हैं, जिसे दुनिया तक पहुंचाने का श्रेय शेख दीन मोहम्मद को दिया जाता है। दीन मोहम्मद का 1851 में ब्राइटन में निधन हुआ। लेकिन उनकी विरासत आज भी हर उस शैंपू की बोतल में जिंदा है, जिसका नाम भारतीय ‘चंपी’ से निकला है।
PERM सस्पेंशन: IT कंपनियों पर रोक से भारतीय टेकीज़ के ग्रीन कार्ड पर क्या असर पड़ेगा?

नई दिल्ली, 10 अक्टूबर 2026: अमेरिका में काम कर रहे हज़ारों भारतीय आईटी कर्मचारियों के मन में इस वक्त एक ही सवाल है: मेरे ग्रीन कार्ड केस का क्या होगा? गुरुवार, 8 अक्टूबर को US श्रम विभाग ने आठ बड़ी कंपनियों को ग्रीन कार्ड प्रक्रिया के एक अहम चरण, PERM प्रोग्राम, से सस्पेंड कर दिया है। क्या हुआ US श्रम सचिव कीथ सोनडरलिंग ने घोषणा की कि Cognizant, Infosys, Tata, Wipro, HCL और Capgemini को परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन (PERM) प्रोग्राम से सस्पेंड किया जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, Microsoft और Adobe भी इस सूची में हैं। सोनडरलिंग के अनुसार, विभाग इन कंपनियों से जुड़ी कोई नई PERM अर्ज़ी स्वीकार नहीं करेगा और लंबित अर्ज़ियों को भी प्रोसेस नहीं करेगा। घोषणा के समय उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस भी मौजूद थे। रिपोर्ट्स में Tata को टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज़ (TCS) बताया गया है। PERM क्या है ट्रिब्यून के मुताबिक, PERM एक अलग प्रक्रिया है, जो आमतौर पर ज़्यादातर रोज़गार-आधारित ग्रीन कार्ड के लिए याचिका दाखिल करने से पहले ज़रूरी होती है। इसमें नियोक्ता को साबित करना होता है कि उस नौकरी के लिए कोई योग्य, इच्छुक और उपलब्ध अमेरिकी कर्मचारी नहीं मिला। यानी H-1B पर काम कर रहे कर्मचारी के लिए ग्रीन कार्ड की सीढ़ी यहीं से शुरू होती है। ये भी पढ़ें:CJP Protest: ममता बनर्जी समेत TMC नेता हिरासत में, जंतर-मंतर कूच से पहले दिल्ली में कड़ी सुरक्षा भारतीय टेकीज़ पर क्या असर हो सकता है ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार, जिन कर्मचारियों की PERM प्रक्रिया अभी शुरू होनी है, वे अपनी “प्रायोरिटी डेट” तय नहीं करा पाएंगे। यही तारीख ग्रीन कार्ड कतार में उनकी जगह तय करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय नागरिकों के लिए यह असर खास तौर पर गंभीर हो सकता है, क्योंकि रोज़गार-आधारित ग्रीन कार्ड पर देश-वार सीमाएं हैं और बैकलॉग पहले से लंबा है। अमेरिकी प्रशासन का तर्क सोनडरलिंग ने कहा कि 2009 से अब तक सिर्फ इन्हीं कंपनियों ने लगभग 30 लाख विदेशी कामगारों के लिए अर्ज़ी दी है। उनके मुताबिक, इन्हें 2.3 लाख से ज़्यादा H-1B वीज़ा मंज़ूरियां और 1 लाख से ज़्यादा परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन मिले हैं। ट्रिब्यून के अनुसार, प्रशासन का तर्क है कि इस प्रथा से अमेरिकी नागरिक नौकरी बाज़ार से बाहर हुए। Microsoft और Adobe के मामले में रिपोर्ट्स में कई सक्रिय संघीय जांचों का ज़िक्र है। क्या अभी साफ नहीं है उपलब्ध रिपोर्ट्स में यह स्पष्ट नहीं है कि यह सस्पेंशन कितने समय के लिए है। यह भी साफ नहीं है कि पहले से दाखिल हो चुके ग्रीन कार्ड मामलों और H-1B पर काम कर रहे मौजूदा कर्मचारियों पर इसका क्या असर होगा। हमें कंपनियों की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया भी नहीं मिली है। प्रभावित कर्मचारियों को अपनी कंपनी के HR या इमिग्रेशन वकील से सलाह लेनी चाहिए। आगे क्या स्थिति साफ होने पर, खासकर कंपनियों के बयान और श्रम विभाग के अगले दिशा-निर्देश आने पर, खबर अपडेट की जाएगी।
FY27 Market Borrowing घटा: ₹17.2 लाख करोड़ से करीब ₹16 लाख करोड़ हुआ अनुमान

भारत सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) के लिए अपने market borrowing plan को संशोधित किया है। केंद्रीय बजट में सरकार ने पूरे साल के लिए ₹17.2 लाख करोड़ के gross market borrowing का अनुमान रखा था। अब सरकार द्वारा जारी नए आंकड़ों के मुताबिक, पूरे साल का gross market borrowing घटकर करीब ₹16 लाख करोड़ रहने की उम्मीद है यानी बजट अनुमान से करीब ₹1.2 लाख करोड़ कम। यह बदलाव तब सामने आया है जब सरकार ने वित्त वर्ष के दूसरे हिस्से (अक्टूबर 2026-मार्च 2027) के लिए अपना borrowing calendar जारी किया। सरकार ने बताया कि पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में करीब ₹8.14 लाख करोड़ का उधार पहले ही लिया जा चुका है, और दूसरी छमाही में ₹7.86 लाख करोड़ का gross borrowing dated securities के जरिए किया जाएगा। यह डेवलपमेंट इसलिए अहम है क्योंकि market borrowing सीधे तौर पर government bond supply, बॉन्ड मार्केट के सेंटिमेंट और ब्याज दरों से जुड़े अनुमानों को प्रभावित करता है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि net market borrowing जो fiscal deficit को फाइनेंस करने के लिए इस्तेमाल होता है बजट अनुमान ₹11.73 लाख करोड़ के आसपास ही बना हुआ है। FY27 में सरकार कितना उधार लेगी? Particular Amount Original Gross Market Borrowing (Budget Estimate) ₹17.2 लाख करोड़ Latest Gross Market Borrowing करीब ₹16 लाख करोड़ (सटीक आंकड़ा ₹15,99,506 करोड़) Reduction करीब ₹1.2 लाख करोड़ (₹1.21 लाख करोड़) Net Market Borrowing ₹11.73 लाख करोड़ (बजट अनुमान के बराबर) Fiscal Deficit (Budget Estimate) ₹16.96 लाख करोड़ Fiscal Deficit as % of GDP 4.3% इन आंकड़ों को समझें तो सरकार का gross borrowing लक्ष्य घटा है, लेकिन net borrowing जिससे असल में fiscal deficit फाइनेंस होता है लगभग वैसा ही बना हुआ है जैसा बजट में तय किया गया था। इसकी वजह है repayment/redemption requirement का घटना, जिसे आगे समझाया गया है। ₹17.2 लाख करोड़ से Borrowing क्यों घटी? सरकार के मुताबिक, इस कमी की मुख्य वजह repayment requirement का घटना है। बजट में FY27 के लिए repayment requirement ₹5.47 लाख करोड़ अनुमानित था, जो अब घटकर करीब ₹4.36 लाख करोड़ रह गया है। इसके पीछे मुख्य कारण debt switch और buyback ऑपरेशंस हैं। सरकार ने वित्त वर्ष के दौरान securities के switch auctions किए, जिनके जरिए पुरानी, जल्द मैच्योर होने वाली securities को नई, लंबी अवधि की securities से बदला गया। इससे आने वाले समय में एक साथ बड़ी रकम चुकाने का दबाव कम हुआ, और उसी वजह से कुल borrowing requirement भी घट गई। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि दूसरी छमाही के दौरान भी switch और buyback ऑपरेशंस जारी रहेंगे, ताकि redemption schedule को बेहतर तरीके से manage किया जा सके। Gross Market Borrowing और Net Market Borrowing में क्या अंतर है? आम पाठकों के लिए यह अंतर समझना जरूरी है: Gross Market Borrowing: यह वह कुल राशि है जो सरकार नई government securities जारी करके बाजार से जुटाती है। Net Market Borrowing: यह वह राशि है जो gross borrowing में से पुराने कर्ज की repayment/redemption घटाने के बाद बचती है। यही राशि वास्तव में fiscal deficit को फाइनेंस करने के काम आती है। सीधे शब्दों में — gross borrowing कम होने का मतलब यह नहीं कि सरकार की फाइनेंसिंग जरूरत कम हो गई है। इसका बड़ा हिस्सा इस बात पर निर्भर करता है कि इस साल कितनी पुरानी securities मैच्योर हो रही हैं और उनका भुगतान कैसे मैनेज किया जा रहा है। FY27 के दूसरे छमाही में कितना Borrowing होगा? अक्टूबर 2026 से मार्च 2027 के बीच सरकार ₹7.86 लाख करोड़ का gross borrowing dated securities के जरिए करेगी। इसमें ₹15,000 करोड़ Sovereign Green Bonds (SGrBs) के जरिए जुटाए जाएंगे। यह पूरा borrowing 23 weekly auctions के जरिए पूरा किया जाएगा, जो मार्च की शुरुआत तक चलेगा। हर हफ्ते के ऑक्शन का साइज करीब ₹33,000 करोड़ से ₹36,000 करोड़ के बीच रहेगा। इसके अलावा, तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर 2026) में सरकार Treasury Bills के जरिए हर हफ्ते ₹23,000 करोड़ जुटाएगी, जो 13 auction weeks में बंटा होगा इसमें ₹8,000 करोड़ 91-दिन के बिल्स, ₹8,000 करोड़ 182 दिन के बिल्स और ₹7,000 करोड़ 364-दिन के बिल्स के जरिए आएंगे। सरकार किन Bonds के जरिए पैसा जुटाएगी? Dated Government Securities: ये लंबी अवधि की securities होती हैं, जिन पर तय ब्याज दर के साथ एक निश्चित मैच्योरिटी अवधि होती है। सरकार का ज्यादातर borrowing इसी माध्यम से होता है। Treasury Bills (T-Bills): ये कम अवधि (91, 182 और 364 दिन) की securities हैं, जो short-term फंडिंग जरूरतों को पूरा करने में मदद करती हैं। Sovereign Green Bonds (SGrBs): इनके जरिए जुटाई गई राशि पर्यावरण से जुड़ी परियोजनाओं में इस्तेमाल के लिए तय की जाती है। H2 FY27 में ₹15,000 करोड़ इसी माध्यम से जुटाए जाएंगे। Fiscal Deficit पर इसका क्या असर होगा? fiscal deficit वह अंतर है जो सरकार की कुल कमाई (राजस्व) और कुल खर्च के बीच होता है, जिसे उधार लेकर पूरा किया जाता है। FY27 के लिए बजट में fiscal deficit ₹16.96 लाख करोड़ यानी GDP का 4.3% तय किया गया था। यहां यह स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है gross market borrowing घटने का सीधा मतलब यह नहीं है कि fiscal deficit भी घट गया है। मौजूदा रिपोर्टिंग के मुताबिक net market borrowing लगभग बजट स्तर (₹11.73 लाख करोड़) पर ही बना हुआ है, जो दिखाता है कि fiscal deficit से जुड़ी फाइनेंसिंग जरूरत में कोई बड़ा बदलाव फिलहाल सामने नहीं आया है। gross borrowing में कमी मुख्य रूप से घटी हुई repayment जरूरत की वजह से है, न कि कम fiscal deficit की वजह से। Bond Market पर क्या असर पड़ सकता है? gross borrowing में कमी का मतलब है कि बाजार में सरकारी बॉन्ड्स की supply उतनी ज्यादा नहीं बढ़ेगी जितनी बजट अनुमान के हिसाब से हो सकती थी। इससे government securities की demand-supply स्थिति पर असर पड़ सकता है। रिपोर्टिंग के मुताबिक, H2FY27 का यह borrowing plan बाजार की उम्मीदों के अनुरूप ही है, जिससे बॉन्ड यील्ड पर दबाव कम होने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इस बारे में कोई निश्चित भविष्यवाणी नहीं की जा सकती बॉन्ड यील्ड पर वैश्विक ब्याज दर के रुझान, महंगाई के आंकड़े और निवेशकों की मांग जैसे
Sensex 315 अंक चढ़ा, Nifty भी संभला; Realty-Auto शेयरों में तेजी, बैंकिंग शेयरों का भी सहारा

शुक्रवार, 25 सितंबर 2026 को घरेलू शेयर बाजार में रिकवरी देखने को मिली। बीएसई सेंसेक्स 315.20 अंक या 0.43 प्रतिशत की बढ़त के साथ 73,895.74 पर बंद हुआ, जबकि एनएसई निफ्टी 50, 77.40 अंक या 0.34 प्रतिशत मजबूत होकर 23,140.50 पर बंद हुआ। यह तेजी पिछले कारोबारी सत्र यानी गुरुवार की तीखी गिरावट के बाद आई है, जब बीमा क्षेत्र से जुड़ी नियामकीय खबरों के चलते बैंकिंग और वित्तीय शेयरों में बड़ी बिकवाली देखी गई थी। शुक्रवार को रियल्टी और ऑटो शेयरों में खासी खरीदारी रही, वहीं बैंकिंग शेयरों में भी चुनिंदा खरीदारी का सहारा मिला। हालांकि आईटी शेयरों में दबाव बना रहा, जिसने बाजार की तेजी को कुछ हद तक सीमित किया। बता दें कि इस बढ़त के बावजूद निफ्टी लगातार सातवें सप्ताह गिरावट के साथ बंद हुआ, जो 2020 के बाद सबसे लंबा साप्ताहिक गिरावट सिलसिला है। यानी शुक्रवार की तेजी को साप्ताहिक रुझान के उलट एक दिन की रिकवरी के तौर पर देखा जा रहा है। Sensex और Nifty का आज का हाल Sensex: क्लोजिंग लेवल: 73,895.74 बढ़त: 315.20 अंक प्रतिशत बढ़त: 0.43% दिन का उच्चतम स्तर: करीब 73,906.96 Nifty 50: क्लोजिंग लेवल: 23,140.50 बढ़त: 77.40 अंक प्रतिशत बढ़त: 0.34% कारोबार के दौरान सेंसेक्स दोपहर 3 बजे तक 73,839.15 पर था, फिर क्लोजिंग ऑक्शन सत्र (CAS) में मजबूत होकर 73,881.44 तक पहुंचा और अंतिम रूप से 73,895.74 पर बंद हुआ। इसी तरह निफ्टी भी अंतिम कारोबारी घंटों में मजबूती दिखाते हुए 23,140.50 पर बंद हुआ। पिछले कारोबारी सत्र में क्या हुआ था? गुरुवार को घरेलू बाजार में भारी बिकवाली देखी गई थी। रिपोर्ट्स के अनुसार, बीमा नियामक द्वारा बीमा कमीशन और वितरण लागत से जुड़े नियमों में संभावित बदलाव की खबरों ने वित्तीय और बीमा से जुड़ी कंपनियों के शेयरों पर दबाव डाला, जिसका असर पूरे बाजार पर पड़ा। इसके साथ ही अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में बढ़ोतरी और वैश्विक बाजारों की कमजोरी ने भी सेंटीमेंट को प्रभावित किया। इस गिरावट में बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं से जुड़े शेयर सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। गुरुवार की इसी बिकवाली के बाद निवेशकों ने शुक्रवार को मूल्यांकन के आधार पर खरीदारी (वैल्यू बाइंग) की, जिससे बाजार में आंशिक रिकवरी देखने को मिली। Banking और Auto Stocks में खरीदारी शुक्रवार को सेंसेक्स पैक में एक्सिस बैंक, महिंद्रा एंड महिंद्रा और एशियन पेंट्स प्रमुख गेनर्स में शामिल रहे। एक्सिस बैंक की बढ़त से बैंकिंग शेयरों में खरीदारी का संकेत मिला, जबकि महिंद्रा एंड महिंद्रा की तेजी ने ऑटो सेक्टर को सहारा दिया। रियल्टी और ऑटो शेयरों में सबसे मजबूत प्रदर्शन देखने को मिला। हालांकि यह खरीदारी पूरी तरह व्यापक (broad-based) नहीं, बल्कि चुनिंदा शेयरों तक सीमित रही, क्योंकि सेक्टोरल इंडेक्स पर मिला-जुला रुख देखने को मिला। एनएसई पर सेक्टोरल इंडेक्स में निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स टॉप गेनर रहा। Oil & Gas Stocks का प्रदर्शन शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) उन शेयरों में शामिल रहा जो 52-हफ्तों के निचले स्तर पर पहुंचे। रिलायंस के साथ-साथ पीबी फिनटेक, हिंदुस्तान यूनिलीवर, टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स और मारुति सुजुकी इंडिया के शेयर भी 52-सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गए। यह दिखाता है कि तेल एवं गैस तथा कुछ अन्य हैवीवेट सेक्टरों में कमजोरी बनी रही, भले ही व्यापक सूचकांक हरे निशान में बंद हुए। दूसरे सेक्टर्स का हाल शुक्रवार के कारोबार में सेक्टोरल इंडेक्स मिले-जुले रहे: आईटी: भारतीय स्टॉक मार्केट पर एक रिपोर्ट के अनुसार, मिश्रित वैश्विक संकेतों के बीच आईटी शेयरों में दबाव देखने को मिला, जिसने बाजार की तेजी को सीमित किया कंज्यूमर ड्यूरेबल्स: एनएसई पर टॉप सेक्टोरल गेनर रहा मिडकैप और स्मॉलकैप: निफ्टी मिडकैप 100, 0.14 प्रतिशत नीचे बंद हुआ, जबकि निफ्टी स्मॉलकैप 100, 0.15 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुआ अन्य क्षेत्रों (फार्मा, मेटल, मीडिया, एफएमसीजी) से जुड़े पुष्ट आंकड़े फिलहाल सीमित मात्रा में उपलब्ध हैं, इसलिए उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना उचित नहीं होगा। बाजार में तेजी की प्रमुख वजहें शुक्रवार की रिकवरी के पीछे प्रमुख रूप से ये कारण सामने आए हैं: गुरुवार की तीखी गिरावट के बाद वैल्यू बाइंग यानी मूल्यांकन के आधार पर खरीदारी रियल्टी और ऑटो शेयरों में खरीदारी का सहारा चुनिंदा बैंकिंग शेयरों (जैसे एक्सिस बैंक) में मजबूती निफ्टी इंडिया वोलैटिलिटी इंडेक्स (VIX) में 7.25 प्रतिशत की गिरावट, जो नियर-टर्म अस्थिरता की आशंका कम होने का संकेत है वहीं आईटी शेयरों में कमजोरी और वैश्विक बाजारों के मिश्रित रुझान ने तेजी को सीमित रखा। FII और DII Activity 25 सितंबर 2026 के लिए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI/FII) और घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) की अंतिम और पुष्ट खरीद-बिक्री का पूरा आंकड़ा फिलहाल स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं है। हालांकि हाल के सत्रों में विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली की खबरें आई हैं, जो घरेलू बाजार के लिए एक प्रमुख दबाव कारक बनी हुई थीं। सटीक और अंतिम आंकड़े आने पर इसे अपडेट किया जाएगा। आज के बाजार में कौन से शेयर चर्चा में रहे? ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (TCI): शेयर बायबैक प्रस्ताव पर विचार की घोषणा के बाद करीब 15 प्रतिशत उछला एक्सिस बैंक, महिंद्रा एंड महिंद्रा, एशियन पेंट्स: सेंसेक्स पैक में टॉप गेनर्स रहे रिलायंस इंडस्ट्रीज, पीबी फिनटेक, हिंदुस्तान यूनिलीवर, टाटा मोटर्स पैसेंजर व्हीकल्स, मारुति सुजुकी: 52-सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंचे IPCA लैबोरेटरीज, लॉरस लैब्स, ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स: निफ्टी फार्मा इंडेक्स में टॉप लूजर रहे यह जानकारी केवल बाजार की गतिविधि की रिपोर्टिंग के लिए है, किसी भी शेयर में निवेश की सलाह के तौर पर नहीं ली जानी चाहिए। Global Market और Crude Oil का असर वैश्विक स्तर पर संकेत मिश्रित रहे। एशियाई बाजारों में शुक्रवार को मिला-जुला कारोबार देखा गया, क्योंकि अमेरिकी बाजार लगातार तीसरे सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ था। अमेरिका में 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड बढ़कर करीब 5.22 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई, जिसने वैश्विक निवेशक धारणा को प्रभावित किया। क्रूड ऑयल को लेकर अमेरिका-ईरान वार्ता की संभावनाओं पर बाजार की नजर बनी हुई है, जिसका असर आगामी सत्रों में तेल कीमतों और इससे जुड़े शेयरों पर पड़ सकता है। हालांकि भविष्य की कच्चे तेल की कीमतों को लेकर कोई निश्चित अनुमान नहीं लगाया जा सकता। क्या यह सिर्फ एक दिन की रिकवरी है? गुरुवार की तीखी गिरावट के बाद शुक्रवार को बाजार में सीमित रिकवरी देखने को मिली, लेकिन यह किसी बड़े ट्रेंड-रिवर्सल का संकेत नहीं कहा जा
Patanjali Ghee विवाद पर Baba Ramdev का बड़ा बयान: ‘हमारा घी 100% शुद्ध, अफवाह फैलाई जा रही’, बृजभूषण सिंह के आरोपों

New Delhi: Patanjali Ghee controversy पर योग गुरु और Patanjali Ayurved के सह-संस्थापक Baba Ramdev ने बुधवार को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी सफाई पेश की. उन्होंने कहा कि Patanjali Ghee 100% शुद्ध है और इसकी गुणवत्ता पर फैलाई जा रही अफवाहें निराधार हैं. ‘पतंजलि घी कई देशों में बिक रहा, किसी टेस्ट में नहीं फैला’ Baba Ramdev ने कहा कि Patanjali Ghee न केवल भारत में, बल्कि कई विदेशी बाजारों में भी बिक रहा है. अब तक किसी भी lab test में यह घी fail नहीं हुआ है. उन्होंने दावा किया कि Patanjali Foods के उत्पाद की गुणवत्ता पर सवाल उठाना गलत है. उन्होंने कहा, “पतंजलि घी पर अफवाह फैलाई जा रही है, हमारा घी 100% शुद्ध है. हमारी कंपनी कई देशों में उत्पाद बेचती है और कहीं भी किसी टेस्ट में फेल नहीं हुआ.” बृजभूषण सिंह के आरोपों पर पलटवार Baba Ramdev ने BJP सांसद Brijbhushan Sharan Singh के पुराने बयानों पर भी पलटवार किया. उन्होंने कहा कि सिंह ने सुनी-सुनाई बातों के आधार पर Patanjali Ghee के खिलाफ बयान दिया था. साथ ही, उन्होंने अपने ऊपर लगाए गए व्यक्तिगत आरोपों पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “हम कोई नशेड़ी-गंजेड़ी साधु नहीं हैं… हम गांजे की चिलम नहीं लगाते हैं.” ये भी पढ़ें:अखिलेश यादव का EC पर बड़ा आरोप: ‘निष्पक्ष नहीं तो सरकारें असंवैधानिक’ | UP Elections 2027 50 करोड़ रुपये का मानहानि दावा गौरतलब है कि Patanjali Foods की ओर से Brijbhushan Sharan Singh के खिलाफ 50 करोड़ रुपये का मानहानि दावा किया गया है. इसके बाद भी बृजभूषण सिंह सार्वजनिक रूप से अपने आरोपों पर कायम रहने की बात कह चुके हैं. अब Baba Ramdev के ताजा बयान के बाद सवाल फिर उठ रहा है क्या 50 करोड़ के मानहानि केस के बीच Brijbhushan Sharan Singh अपने पुराने बयान से पीछे हटे हैं? क्या विवाद खत्म होने की ओर? क्या कानूनी कार्रवाई के दबाव में दोनों पक्षों के बीच विवाद खत्म होने की ओर है? हालांकि, Brijbhushan Singh के बयान बदलने या मानहानि केस के डर से ऐसा करने की बात की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल सामने नहीं है. Legal experts का कहना है कि defamation case में दोनों पक्षों के बीच settlement हो सकता है, लेकिन अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है. Patanjali Ghee की गुणवत्ता पर FSSAI का क्या रुख? Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) ने अभी तक Patanjali Ghee के खिलाफ कोई आधिकारिक कार्रवाई या warning जारी नहीं की है. Baba Ramdev ने इस बात का भी जिक्र किया कि अगर कोई regulatory issue होता, तो FSSAI द्वारा action लिया जाता. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न FAQs 1.Baba Ramdev ने Patanjali Ghee पर क्या कहा? Baba Ramdev ने कहा कि Patanjali Ghee 100% शुद्ध है और इसकी गुणवत्ता पर फैलाई जा रही अफवाहें निराधार हैं. घी कई देशों में बिक रहा है और किसी टेस्ट में fail नहीं हुआ. 2.Brijbhushan Sharan Singh ने क्या आरोप लगाए थे? Brijbhushan Sharan Singh ने Patanjali Ghee की गुणवत्ता पर सवाल उठाए थे और बाबा रामदेव पर व्यक्तिगत आरोप भी लगाए थे. 3.Patanjali Foods ने कितने रुपये का मानहानि दावा किया? Patanjali Foods ने Brijbhushan Sharan Singh के खिलाफ 50 करोड़ रुपये का मानहानि दावा किया है. 4.क्या FSSAI ने Patanjali Ghee पर कोई कार्रवाई की? नहीं, FSSAI ने अभी तक Patanjali Ghee के खिलाफ कोई आधिकारिक कार्रवाई या warning जारी नहीं की है.
Sharad Pawar टाटा ट्रस्ट्स विवाद: चंद्रशेखरन एक्सटेंशन पर बोले “संवैधानिक प्रक्रिया का पालन हो”

New Delhi: देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घराने Tata Group में चल रही अंदरूनी खींचतान अब पूरी तरह सार्वजनिक हो चुकी है। इस Sharad Pawar टाटा ट्रस्ट्स विवाद में अब NCP-SP प्रमुख Sharad Pawar की सीधी एंट्री हो गई है उन्होंने X पर एक विस्तृत बयान जारी करते हुए साफ कहा है कि टाटा समूह का परोपकारी ढांचा भारत की धरोहर है, और Tata Trusts के अधिकारों को कमज़ोर करना देश के हित में नहीं होगा। Sharad Pawar टाटा ट्रस्ट्स विवाद: शुरू कैसे हुआ यह पूरा मामला 17 सितंबर 2026 को हुई Tata Sons बोर्ड बैठक के बाद गहराया। बोर्ड ने N Chandrasekaran को फरवरी 2027 से अगले 5 सालों के लिए फिर से Executive Chairman बनाने का प्रस्ताव 4-1 के बहुमत से पास किया। Tata Trusts के चेयरमैन Noel Tata ने इस फैसले के खिलाफ वोट दिया, जबकि ट्रस्ट के दूसरे नॉमिनी डायरेक्टर Venu Srinivasan ने समर्थन में वोट किया। यही असहमति पूरे विवाद की जड़ बनी। इसी बैठक में Tata Sons की स्टॉक एक्सचेंज लिस्टिंग की दिशा में कदम बढ़ाने का प्रस्ताव भी पास हुआ। जमशेदजी टाटा आणि टाटा कुटुंबाने उद्योगाला समाजसेवेची मूल्याधिष्ठित दिशा दिली. त्यामुळे टाटा ट्रस्टची सामाजिक बांधिलकी आणि संस्थात्मक भूमिका जपली गेली पाहिजे. टाटा समूहाच्या नेतृत्वाबाबत निर्णय होताना संस्थात्मक प्रक्रिया आणि ट्रस्टच्या भूमिकेचा आदर होणं आवश्यक आहे. कारण… pic.twitter.com/4dNklgm8tH — Sharad Pawar (@PawarSpeaks) September 22, 2026 Articles of Association और Veto Power की जंग Tata Trusts और Noel Tata का तर्क है कि कंपनी के Articles of Association के तहत चेयरमैन के चुनाव या एक्सटेंशन के लिए ट्रस्ट द्वारा नामांकित दोनों (बहुमत) डायरेक्टर्स की सहमति ज़रूरी है। चूंकि 2 नॉमिनी में से केवल 1 ने ही समर्थन किया, इसलिए Tata Trusts इस फैसले को कानूनी रूप से अमान्य मान रहा है। पवार ने भी इसी बिंदु पर ज़ोर देते हुए कहा कि 4-1 का प्रस्ताव कानूनी रूप से वैध नहीं ठहरता, और उन्होंने Supreme Court के उस पुराने फैसले का हवाला दिया जिसमें नॉमिनी डायरेक्टर्स के विशेष सहमति अधिकार को मान्यता दी गई थी। 66% हिस्सेदारी और Listing पर मतभेद टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी Tata Sons में लगभग 66% हिस्सेदारी Sir Ratan Tata Trust और Sir Dorabji Tata Trust समेत अन्य एलाइड ट्रस्ट्स के पास है। RBI के नियमों के मुताबिक Upper Layer NBFC होने के कारण Tata Sons पर शेयर बाजार में लिस्ट होने का दबाव है, लेकिन Tata Trusts को डर है कि लिस्टिंग के बाद पब्लिक शेयरहोल्डर्स के आने से ग्रुप पर ट्रस्ट्स का कंट्रोल और चैरिटी के लिए मिलने वाला डिविडेंड प्रभावित हो सकता है। Sharad Pawar ने क्या कहा दिग्गज नेता और पूर्व महाराष्ट्र मुख्यमंत्री Sharad Pawar ने अपने बयान में टाटा समूह को महाराष्ट्र से गहरे जुड़ाव वाली एक राष्ट्रीय संस्था बताया। उन्होंने कहा कि जमशेदजी टाटा, सर दोराबजी और सर रतन टाटा की सोच थी कि बिजनेस से बनी संपत्ति समाज सेवा में जानी चाहिए यही वजह है कि Tata Sons में 66% हिस्सेदारी जानबूझकर व्यक्तिगत हाथों के बजाय परोपकारी ट्रस्ट्स को दी गई थी, ताकि कोई एक व्यक्ति इसका मालिक न बन सके। पवार ने स्पष्ट किया कि यह डिज़ाइन जानबूझकर बनाया गया था, महज़ संयोग नहीं अच्छा बिजनेस चलता है तो उसी से मिलने वाला डिविडेंड स्वास्थ्य, शिक्षा, रिसर्च और ग्रामीण आजीविका जैसे सार्वजनिक हित के कामों को फंड करता है। यह भी पढ़ें:Russia Ukraine मिसाइल हमला: कीव में ताबड़तोड़ बमबारी से 19 लोग घायल, बच्चे भी शामिल संवैधानिक प्रक्रिया की अपील पवार ने Tata Sons और Tata Trusts, दोनों पक्षों से आग्रह किया कि वे इस मतभेद को संवाद, तय प्रक्रिया, और Tata Group के दशकों पुराने गवर्नेंस नियमों के दायरे में ही सुलझाएं। उन्होंने कहा कि यह विवाद सिर्फ एक सामान्य बोर्डरूम असहमति नहीं, बल्कि इससे कहीं बड़ा मसला है, और नेतृत्व से जुड़े विवादों को टकराव के बजाय रचनात्मक बातचीत और कानूनी प्रक्रिया के ज़रिए ही सुलझाया जाना चाहिए। इस विवाद का Tata Group पर क्या असर पड़ेगा साइरस मिस्त्री विवाद के बाद यह टाटा ग्रुप में मैनेजमेंट बनाम ट्रस्ट्स की अब तक की सबसे बड़ी संवैधानिक लड़ाई मानी जा रही है। 17 सितंबर की वोटिंग के बाद Tata Sons Board और Tata Trusts के बीच कानूनी रास्ता अपनाने की आशंका भी बढ़ गई है। इस बीच, टाटा समूह की लिस्टेड कंपनियों जैसे TCS, Tata Motors, और Tata Steel के शेयरधारक इस विवाद के जल्द से जल्द बातचीत से सुलझने का इंतज़ार कर रहे हैं, क्योंकि इसका सीधा असर निवेशकों के भरोसे पर पड़ सकता है। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) Q1: Sharad Pawar टाटा ट्रस्ट्स विवाद में क्यों कूदे? उन्होंने Tata Trusts के परोपकारी ढांचे और गवर्नेंस अधिकारों की रक्षा को ज़रूरी बताते हुए दोनों पक्षों से संवाद के ज़रिए मसला सुलझाने की अपील की। Q2: विवाद की शुरुआत कब और कैसे हुई? 17 सितंबर 2026 को Tata Sons की बोर्ड बैठक में N Chandrasekaran के 5 साल के एक्सटेंशन को 4-1 वोट से पास किए जाने के बाद। Q3: Tata Trusts के पास Tata Sons में कितनी हिस्सेदारी है? लगभग 66%, विभिन्न एलाइड ट्रस्ट्स के ज़रिए। Q4: Noel Tata ने फैसले के खिलाफ वोट क्यों दिया? उनका तर्क है कि Articles of Association के तहत दोनों नॉमिनी डायरेक्टर्स की सहमति ज़रूरी है, जो इस मामले में नहीं मिली। Q5: इस विवाद का निवेशकों पर क्या असर हो सकता है? TCS, Tata Motors और Tata Steel जैसी लिस्टेड कंपनियों के शेयरधारक जल्द समाधान का इंतज़ार कर रहे हैं, क्योंकि लंबा खिंचता विवाद निवेशकों के भरोसे को प्रभावित कर सकता है।
