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Viral Fever & Cough: Flu से बचने के लिए अपनाएं ये 7 जरूरी उपाय

Viral Fever & Cough: Flu से बचने के लिए अपनाएं ये 7 जरूरी उपाय

New Delhi: इन दिनों दिल्ली-NCR समेत कई शहरों में बुखार, गले में दर्द और शरीर दर्द के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। डॉक्टरों के मुताबिक, इस सर्ज में इन्फ्लूएंजा A का H3N2 स्ट्रेन प्रमुख रोल निभा रहा है, जबकि H1N1, राइनोवायरस, एडेनोवायरस और COVID-19 जैसे कई वायरस भी साथ-साथ फैल रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से भीड़-भाड़ वाली जगहों पर मास्क लगाने, हाथों की सफाई रखने और लक्षण गंभीर होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करने की सलाह दी है। ये भी पढ़ें:अलास्का की बर्फ में शिफॉन साड़ी: जब माधुरी दीक्षित ठंड से नीली पड़ गईं, अनिल कपूर ने पहनीं 40 जैकेट क्या हैं वायरल Flu के लक्षण? वायरल संक्रमण में आमतौर पर तेज बुखार, सूखी खांसी, गले में खराश, बहती नाक, सिरदर्द, शरीर और जोड़ों में दर्द, थकान तथा भूख कम लगना दिख सकता है। कुछ मामलों में मतली, उल्टी या दस्त भी हो सकते हैं। अगर बुखार 2-3 दिन से ज्यादा रहे, सांस लेने में दिक्कत हो या बच्चे की हालत अचानक बिगड़े, तो बिना देर किए डॉक्टर से मिलें। फ्लू से बचने के 7 एहतियात मास्क पहनें: भीड़ वाली जगह, मेट्रो, बस, मॉल और अस्पताल में मास्क पहनें। हाथ धोएं: साबुन से कम से कम 20 सेकंड तक हाथ धोएं या अल्कोहल वाला सैनिटाइजर इस्तेमाल करें। चेहरे को हाथ न लगाएं: बिना हाथ धोए आंख, नाक और मुंह को छूने से बचें। खांसते समय मुंह ढकें: खांसते या छींकते समय रुमाल या कोहनी से मुंह-नाक ढकें। बीमार लोगों से दूरी रखें: बुखार या खांसी वाले व्यक्ति के करीब जाने से बचें और खुद बीमार हों तो घर पर रहें। पानी और आराम लें: खूब पानी, तरल आहार, नींद और आराम लें ताकि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे। खुद से एंटीबायोटिक न लें: वायरल बुखार में एंटीबायोटिक काम नहीं करती। बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न लें। कब करें डॉक्टर से संपर्क? अगर तेज बुखार लगातार रहे, सांस फूले, सीने में दर्द हो, बच्चा बहुत कमजोर लगे, खाना-पानी बंद कर दे या लक्षण 2-3 दिन में सुधार न करें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और पहले से बीमार लोगों को ज्यादा सावधानी रखनी चाहिए। फ्लू के लक्षण शुरू होने के पहले 48 घंटों में डॉक्टर से सलाह लेना ज्यादा असरदार हो सकता है।

बर्थ कंट्रोल मेथड चुनते समय किन बातों का ध्यान रखें?

आज के समय में गर्भनिरोधक के कई विकल्प मौजूद हैं गोलियां, आईयूडी, इंजेक्शन, इम्प्लांट, कंडोम और भी बहुत कुछ। इतने सारे विकल्पों में से सही तरीका चुनना कई बार मुश्किल लग सकता है। असल में कोई एक तरीका सबके लिए सही नहीं होता, सही चुनाव व्यक्ति की सेहत, जीवनशैली और प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है। इस लेख में उन जरूरी बातों के बारे में बताया गया है जिन पर बर्थ कंट्रोल मेथड चुनने से पहले ध्यान देना चाहिए, ताकि डॉक्टर के साथ बातचीत करना आसान हो सके। मेथड चुनने से पहले किन बातों का ध्यान रखें असरदारी (Effectiveness) अलग-अलग तरीकों की गर्भधारण रोकने की क्षमता अलग होती है। आईयूडी और इम्प्लांट जैसे लंबे समय तक चलने वाले तरीके ज्यादा असरदार माने जाते हैं क्योंकि इनमें रोज या हर बार याद रखने की जरूरत नहीं होती। कंडोम या गोलियां भी असरदार होती हैं, लेकिन इनकी सफलता सही और नियमित इस्तेमाल पर निर्भर करती है। सेहत से जुड़ी हिस्ट्री कुछ मेडिकल स्थितियां यह तय करने में भूमिका निभाती हैं कि कौन सा तरीका सुरक्षित है: जिन महिलाओं को ब्लड क्लॉट, कुछ खास तरह के माइग्रेन या हाई ब्लड प्रेशर की समस्या रही हो, उन्हें एस्ट्रोजन वाली गोलियों से बचने की सलाह दी जा सकती है। फाइब्रॉइड्स या heavy periods जैसी स्थितियों में hormonal IUD फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि यह ब्लीडिंग को भी कम करने में मदद करता है। पेल्विक इन्फेक्शन की हिस्ट्री होने पर आईयूडी उपयुक्त है या नहीं, यह डॉक्टर तय करते हैं। डॉक्टर आमतौर पर मेडिकल हिस्ट्री और मौजूदा दवाओं की जांच करने के बाद ही सही तरीका सुझाते हैं। सुविधा और जीवनशैली यह सोचना भी जरूरी है कि कोई तरीका रोजमर्रा की दिनचर्या में कितना फिट बैठता है: रोज लेने वाले तरीके (जैसे गोली) में हर दिन लगभग एक ही समय पर याद रखना जरूरी होता है। लंबे समय तक चलने वाले तरीके (जैसे आईयूडी या इम्प्लांट) लगाने के बाद बार-बार ध्यान देने की जरूरत नहीं होती, ये प्रकार के हिसाब से 3 से 10 साल तक चल सकते हैं। बैरियर तरीके (जैसे कंडोम) सिर्फ संबंध बनाते समय इस्तेमाल होते हैं और इनमें किसी रोजाना रूटीन की जरूरत नहीं। अगर रोज कुछ याद रखना मुश्किल लगता है, तो लंबे समय तक चलने वाला तरीका बेहतर हो सकता है। भविष्य में गर्भधारण की योजना अगर नजदीक भविष्य में गर्भधारण की योजना है, तो ऐसा तरीका बेहतर हो सकता है जिसे बंद करने के बाद fertility जल्दी वापस आ जाए, जैसे कंडोम या गोली। अगर लंबे समय के लिए या permanent रोकथाम चाहिए, तो आईयूडी, इम्प्लांट या नसबंदी जैसे विकल्पों पर डॉक्टर से बात करना बेहतर है। ये भी पढ़ें:Menopause के दौरान शरीर में होने वाले बदलाव, कब लें डॉक्टर की सलाह साइड इफेक्ट्स Hormonal तरीकों से कुछ महिलाओं को अनियमित ब्लीडिंग, मूड में बदलाव, सिरदर्द या वजन में उतार-चढ़ाव जैसे साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं, हालांकि यह हर व्यक्ति में अलग हो सकता है। Non-hormonal तरीके, जैसे कॉपर आईयूडी या बैरियर मेथड, हार्मोनल साइड इफेक्ट्स से बचाते हैं, लेकिन इनकी अपनी बातें भी ध्यान रखनी होती हैं, जैसे कॉपर आईयूडी से periods heavy हो सकते हैं। यौन संक्रमण (STI) से सुरक्षा यह जानना जरूरी है कि ज्यादातर बर्थ कंट्रोल तरीके, जिनमें गोलियां, आईयूडी और इम्प्लांट शामिल हैं, यौन संक्रमण (STI) से सुरक्षा नहीं देते। कंडोम फिलहाल इकलौता ऐसा तरीका है जो गर्भधारण के साथ-साथ STI से भी बचाता है, इसलिए कुछ महिलाएं इसे किसी और तरीके के साथ इस्तेमाल करना चुनती हैं। लागत और उपलब्धता कुछ तरीकों में शुरुआत में ज्यादा खर्च होता है (जैसे आईयूडी लगवाना), लेकिन ये सालों तक चलते हैं इसलिए long-term में सस्ते पड़ते हैं। कंडोम या महीने की गोलियों जैसे तरीकों में छोटा लेकिन बार-बार होने वाला खर्च होता है। सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं, इंश्योरेंस या नजदीकी क्लिनिक की उपलब्धता भी यह तय करने में मदद कर सकती है कि कौन सा तरीका व्यावहारिक है। रिवर्सिबिलिटी ज्यादातर तरीके reversible होते हैं, यानी इस्तेमाल बंद करने के बाद fertility वापस आ जाती है। नसबंदी जैसे permanent तरीके उन लोगों के लिए होते हैं जो भविष्य में गर्भधारण न करने को लेकर पूरी तरह निश्चित हों, और यह फैसला लेने से पहले डॉक्टर से विस्तार से बात करना जरूरी है। कब लें डॉक्टर की सलाह किसी भी hormonal तरीके को शुरू करने से पहले, खासकर अगर ब्लड क्लॉट, माइग्रेन, हाई ब्लड प्रेशर या लिवर की बीमारी की हिस्ट्री हो अगर कोई तरीका शुरू करने के बाद तेज सिरदर्द, असामान्य सूजन या heavy bleeding जैसे लक्षण दिखें अगर स्तनपान करा रही हैं और बर्थ कंट्रोल पर विचार कर रही हैं, क्योंकि इस समय कुछ तरीके ज्यादा उपयुक्त माने जाते हैं अगर periods अनियमित या heavy हैं और ऐसा तरीका चाहिए जो इन्हें मैनेज करने में भी मदद करे अगर यह तय नहीं कर पा रही हैं कि सेहत, जीवनशैली या भविष्य की योजनाओं के हिसाब से कौन सा तरीका सही रहेगा डॉक्टर मेडिकल हिस्ट्री, उम्र और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए सही तरीका सुझाने में मदद कर सकते हैं, न कि हर किसी के लिए एक जैसी सलाह देकर। फैसला लेने में मदद करने वाले Practical Tips अपनी प्राथमिकताओं की लिस्ट बनाएं — असरदारी, सुविधा, लागत या STI से सुरक्षा  और तय करें कि आपके लिए क्या सबसे जरूरी है। कोई नया तरीका शुरू करने पर लक्षणों पर नजर रखें, ताकि अगली विजिट पर डॉक्टर से इस बारे में बात कर सकें। सिर्फ दोस्तों या सोशल मीडिया की सलाह पर भरोसा न करें, क्योंकि हर किसी की सेहत अलग होती है और जो एक व्यक्ति के लिए सही है, जरूरी नहीं दूसरे के लिए भी सही हो। ट्रायल पीरियड के बारे में पूछें। कुछ तरीके शुरुआत में सही न लगने पर बदले जा सकते हैं, इसलिए कुछ समय तक निगरानी रखना सामान्य है। भविष्य की योजनाओं को ध्यान में रखें, जैसे कितनी जल्दी गर्भधारण की सोच रही हैं, क्योंकि यह भी तय करता है कि फिलहाल कौन सा तरीका सही रहेगा। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) 1. कौन सा बर्थ कंट्रोल तरीका सबसे असरदार है? आईयूडी और इम्प्लांट जैसे लंबे समय तक चलने वाले तरीके सबसे असरदार माने जाते हैं, क्योंकि इनकी सफलता दर

Anemia महिलाओं में ज्यादा क्यों होता है? जानिए वजह और बचाव

Anemia

Anemia यानी शरीर में red blood cells या hemoglobin की कमी, महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा देखने को मिलती है। भारत में यह समस्या खासतौर पर आम है, जहां WHO के अनुसार reproductive age की एक बड़ी संख्या में महिलाएं किसी न किसी स्तर की anemia से जूझती हैं। थकान, कमजोरी या चक्कर आने को अक्सर लोग normal समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि यह anemia का संकेत हो सकता है। इस आर्टिकल में यह बताया गया है कि महिलाओं में anemia ज्यादा क्यों होता है, इसके common causes क्या हैं, और इससे बचने के practical तरीके क्या हैं। महिलाओं में Anemia ज्यादा क्यों होता है महिलाओं का शरीर biologically कुछ ऐसी situations से गुजरता है जिनकी वजह से iron और blood की जरूरत बढ़ जाती है। यही वजह है कि anemia महिलाओं में ज्यादा common है। Menstruation हर महीने periods के दौरान blood loss होना anemia की सबसे बड़ी वजहों में से एक है। जिन महिलाओं को heavy periods (जिसे medically menorrhagia कहा जाता है) होते हैं, उनमें iron की कमी होने का खतरा और भी ज्यादा रहता है। Pregnancy Pregnancy के दौरान शरीर को बच्चे की growth के लिए extra blood और iron की जरूरत होती है। अगर diet में यह demand पूरी न हो, तो iron-deficiency anemia होना आम बात है। यही वजह है कि डॉक्टर pregnancy के दौरान iron supplements recommend करते हैं। Poor Diet और Nutrition की कमी कई महिलाओं की diet में iron, folate और vitamin B12 की मात्रा कम होती है, खासकर उन महिलाओं में जो vegetarian हैं या जिनकी diet balanced नहीं है। भारत में सामाजिक कारणों से भी महिलाएं अक्सर अपनी nutrition needs को परिवार की तुलना में कम priority देती हैं। Reproductive Health Conditions Fibroids, endometriosis या PCOS जैसी conditions के कारण heavy या irregular bleeding हो सकती है, जो over time anemia का कारण बन सकती है। Multiple Pregnancies और कम Gap बार-बार pregnancies, खासकर कम gap के साथ, शरीर के iron stores को ठीक से recover होने का मौका नहीं देतीं, जिससे anemia का खतरा बढ़ जाता है। Chronic Conditions Thyroid problems, kidney disease, या कोई chronic inflammatory condition भी red blood cell production को प्रभावित कर सकती है और anemia की वजह बन सकती है। Anemia के Common Symptoms लगातार थकान या कमजोरी महसूस होना चेहरे का पीलापन सांस फूलना, खासकर थोड़ी सी activity के बाद चक्कर आना या सिर हल्का महसूस होना दिल की धड़कन तेज या irregular महसूस होना बाल झड़ना या नाखून कमजोर होना Concentration में दिक्कत ये symptoms धीरे-धीरे बढ़ते हैं, इसलिए कई बार महिलाएं इन्हें रोजमर्रा की थकान समझकर नजरअंदाज कर देती हैं। कब लें डॉक्टर की सलाह अगर थकान या कमजोरी लंबे समय से बनी हुई है और आराम करने के बाद भी ठीक नहीं हो रही अगर periods बहुत heavy हैं या 7 दिन से ज्यादा चल रहे हैं अगर सांस फूलना या दिल की धड़कन तेज होना बार-बार महसूस हो रहा है Pregnancy के दौरान अगर कमजोरी या चक्कर आना ज्यादा महसूस हो अगर बाल झड़ना, नाखून टूटना या त्वचा का पीलापन लगातार बना रहे अगर घर में anemia या किसी blood disorder की family history है डॉक्टर एक simple blood test (CBC) के जरिए anemia की पुष्टि कर सकते हैं और उसकी severity के हिसाब से iron supplements, diet में बदलाव, या underlying cause की जांच जैसे कदम सुझा सकते हैं। हर महिला के लिए treatment अलग हो सकता है, इसलिए किसी भी supplement या दवा को शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूरी है। बचाव और Practical Tips Iron-rich foods शामिल करें। पालक, चुकंदर, गुड़, दालें, अंडे और मीट जैसी चीजें iron का अच्छा source हैं। Vitamin C के साथ लें। Iron के absorption को बेहतर बनाने के लिए iron-rich food के साथ नींबू, संतरा या टमाटर जैसी चीजें लें। Tea-coffee का समय ध्यान रखें। खाने के तुरंत बाद chai या coffee पीने से iron absorption कम हो सकता है, इसलिए बीच में gap रखें। Regular health check-ups कराएं, खासकर अगर periods heavy हैं या pregnancy planning कर रही हैं। Pregnancy के दौरान डॉक्टर की सलाह से supplements लें, खुद से कोई dose शुरू न करें। Heavy bleeding को नजरअंदाज न करें यह सिर्फ anemia नहीं बल्कि किसी underlying condition का भी संकेत हो सकता है। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) 1. Anemia महिलाओं में पुरुषों से ज्यादा क्यों होता है? Menstruation, pregnancy और childbirth के कारण महिलाओं के शरीर से ज्यादा blood और iron loss होता है, जिससे उनमें anemia का खतरा पुरुषों के मुकाबले ज्यादा रहता है। 2. Anemia की पुष्टि कैसे होती है? एक simple blood test, जिसे CBC (Complete Blood Count) कहते हैं, से hemoglobin level चेक करके anemia की पुष्टि की जाती है। 3. क्या anemia सिर्फ diet से ठीक हो सकता है? Mild anemia में diet में बदलाव मदद कर सकता है, लेकिन moderate या severe cases में डॉक्टर supplements या आगे की जांच recommend कर सकते हैं। 4. Heavy periods और anemia में क्या संबंध है? हर महीने ज्यादा blood loss होने से शरीर के iron stores कम होते जाते हैं, जिससे समय के साथ iron-deficiency anemia हो सकता है। 5. Pregnancy में anemia क्यों common है? Pregnancy के दौरान बच्चे की growth के लिए शरीर को ज्यादा blood और iron की जरूरत होती है, जिसे diet अकेले पूरा नहीं कर पाती, इसलिए supplements की सलाह दी जाती है। 6. Anemia के लक्षणों को कब तक नजर अंदाज नहीं करना चाहिए? अगर थकान, चक्कर आना या सांस फूलना 2 हफ्तों से ज्यादा बना हुआ है, तो इसे नजरअंदाज न करते हुए डॉक्टर से मिलना चाहिए। 7. क्या iron supplements बिना डॉक्टर की सलाह के लिए जा सकते हैं? नहीं, iron supplements की dose व्यक्ति की condition पर निर्भर करती है। ज्यादा iron लेना भी नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए डॉक्टर की सलाह जरूरी है। निष्कर्ष महिलाओं में anemia होना काफी हद तक biological कारणों से जुड़ा है, जैसे menstruation और pregnancy, लेकिन diet और lifestyle में सही बदलाव करके इसे काफी हद तक रोका जा सकता है। अगर थकान, कमजोरी या पीलापन जैसे symptoms लगातार

Menopause के दौरान शरीर में होने वाले बदलाव, कब लें डॉक्टर की सलाह

Menopause के दौरान शरीर में बदलाव, कब लें डॉक्टर सलाह

New Delhi: Menopause यानी महिलाओं के periods का हमेशा के लिए बंद हो जाना, आमतौर पर 45 से 55 साल की उम्र के बीच होता है। यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक नेचुरल process है। लेकिन इस दौरान होने वाले hormonal changes शरीर पर कई तरह से असर डालते हैं। भारत में मेनोपॉज़ पर अभी भी खुलकर बात नहीं होती, जिस वजह से कई महिलाओं को समझ नहीं आता कि कौन से symptoms normal हैं और कब डॉक्टर के पास जाना चाहिए। इस आर्टिकल में मेनोपॉज़ के दौरान होने वाले physical और emotional बदलावों के साथ-साथ यह भी बताया गया है कि किन situations में डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। Menopause के दौरान शरीर में क्या बदलाव होते हैं मेनोपॉज़ तब होता है जब ovaries धीरे-धीरे estrogen और progesterone हार्मोन कम बनाने लगती हैं। ये हार्मोन ही menstrual cycle को regulate करते हैं। यह बदलाव अचानक नहीं, बल्कि कई सालों में धीरे-धीरे होता है, जिसकी शुरुआत perimenopause नाम के phase से होती है। Periods में अनियमितता सबसे पहले नजर आने वाले symptoms में से एक है cycle में बदलाव। Periods छोटे, लंबे, हल्के, या heavy हो सकते हैं, या कई महीनों तक आएं ही नहीं इससे पहले कि वे पूरी तरह बंद हो जाएं। यह फेज़ periods पूरी तरह बंद होने से पहले कुछ सालों तक चल सकता है। Hot Flashes और रात में पसीना आना अचानक शरीर में गर्मी महसूस होना, जो आमतौर पर छाती से शुरू होकर गर्दन और चेहरे तक फैलती है, सबसे common symptoms में से एक है। इसे hot flash कहते हैं, जो कुछ मिनट तक रह सकता है और इसके साथ पसीना आना, दिल की धड़कन तेज होना भी हो सकता है। रात में हो तो इसे night sweats कहा जाता है, जिससे नींद डिस्टर्ब होती है। नींद में बदलाव कई महिलाओं को सोने में या नींद बनाए रखने में दिक्कत होती है। यह night sweats से जुड़ा हो सकता है, लेकिन hormonal changes खुद भी sleep quality को प्रभावित करते हैं। Vaginal और Urinary बदलाव Estrogen कम होने से vaginal tissue पतला और dry हो सकता है, जिससे intercourse के दौरान असहजता हो सकती है। कुछ महिलाओं को UTI ज्यादा होने लगता है या बार-बार urine आने की problem भी होती है। मूड में बदलाव Irritability, anxiety और उदासी इस phase में आम हैं। Hormone fluctuations इसकी एक वजह है, लेकिन नींद पूरी न होना और इस उम्र से जुड़ा general stress भी इसमें role निभाता है। वजन और मेटाबॉलिज्म में बदलाव कई महिलाओं का वजन बढ़ने लगता है, खासकर पेट के आसपास, और metabolism slow हो जाता है। इस दौरान muscle mass भी कम हो सकती है। हड्डियों और दिल की सेहत Estrogen bone density और heart health को बनाए रखने में मदद करता है। मेनोपॉज़ के बाद osteoporosis (हड्डियों का कमजोर होना) और heart disease का खतरा बढ़ जाता है, इसलिए इस दौरान regular health check-ups कराना जरूरी हो जाता है। त्वचा और बालों में बदलाव Estrogen कम होने से त्वचा dry हो सकती है और उसकी elasticity कम हो सकती है, साथ ही बाल पतले होने लगते हैं। कुछ महिलाओं को चेहरे पर बाल बढ़ने की problem भी होती है, जो estrogen और androgen के ratio में बदलाव की वजह से होता है। कब लें डॉक्टर की सलाह मेनोपॉज़ खुद किसी treatment की मांग नहीं करता, लेकिन कुछ situations में gynaecologist या डॉक्टर से मिलना जरूरी हो जाता है: Menopause के बाद bleeding होना अगर periods बंद हुए 12 महीने हो चुके हैं और उसके बाद कोई भी bleeding होती है, तो इसकी जांच जरूर करवानी चाहिए, क्योंकि यह किसी underlying problem का संकेत हो सकता है। Perimenopause के दौरान बहुत heavy या लंबे समय तक bleeding होना, जो daily life को प्रभावित करे। Severe hot flashes या रात में पसीना आना, जिससे नींद या routine पर बुरा असर पड़े। लगातार मूड में बदलाव, जिसमें depression या anxiety के symptoms शामिल हों और अपने आप ठीक न हो रहे हों। Intercourse के दौरान दर्द या लगातार vaginal discomfort। बिना किसी वजह के वजन में बदलाव या ऐसी थकान जो आराम करने के बाद भी ठीक न हो। Osteoporosis या heart disease की family history, जिसके लिए पहले से screening और prevention की जरूरत हो सकती है। 40 साल से पहले symptoms दिखना, जो premature menopause का संकेत हो सकता है और इसकी सही जांच जरूरी है। डॉक्टर यह तय करने में मदद कर सकते हैं कि symptoms मेनोपॉज़ का normal हिस्सा हैं या किसी और problem से जुड़े हैं। वे individual health history, symptoms और risk factors के आधार पर lifestyle changes, non-hormonal treatment या hormone therapy जैसे options पर भी सलाह दे सकते हैं। यह भी पढ़ें:दिल्ली में बच्चों की सुरक्षा पर फिर उठे सवाल, 12 दिनों में 4 मामले सामने आए Menopause को मैनेज करने के practical तरीके Physically active रहें। Regular exercise, जैसे walking या light strength training, bone health, वजन और मूड को बेहतर रखने में मदद करती है। Balanced diet लें। Calcium और vitamin D से भरपूर चीजें शामिल करें, साथ ही fruits, vegetables और whole grains भी लें। Sleep hygiene का ध्यान रखें। सोने का समय fix रखना और कमरे को ठंडा रखना, night sweats और sleep problems में मदद कर सकते है। पर्याप्त पानी पिएं और caffeine व alcohol का सेवन कम करें, क्योंकि ये कभी-कभी hot flashes बढ़ा सकते हैं। इस बारे में बात करें। परिवार, दोस्तों या डॉक्टर से अपनी परेशानी share करने से इस phase को emotionally handle करना आसान हो जाता है। Regular check-ups करवाएं, जिसमें bone density test और heart-related जांच शामिल हो, जैसा डॉक्टर सुझाएँ। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) 1. भारत में मेनोपॉज़ आमतौर पर किस उम्र में होता है? भारत में ज्यादातर महिलाओं को 45 से 55 साल के बीच मेनोपॉज़ होता है, average age लगभग 46-48 साल है, हालांकि यह genetics और individual health के आधार पर अलग-अलग हो सकती है। 2. Perimenopause और मेनोपॉज़ में क्या फर्क है? Perimenopause मेनोपॉज़ से पहले का वह phase है जिसमें periods irregular होते हैं और hormones में उतार-चढ़ाव रहता है। मेनोपॉज़ तब माना

स्क्रीन टाइम और जंक फूड बढ़ा रहे PCOS का खतरा: AIMS का बड़ा अध्ययन

किशोरियों में PCOS का खतरा: AIMS स्टडी में खुलासा

New Delhi: मोबाइल फोन पर घंटों समय बिताना, बाहर का खाना ज़्यादा खाना और शारीरिक गतिविधि कम होना आज की किशोरियों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनता जा रहा है। लेकिन यही आदतें आगे चलकर सेहत के लिए परेशानी खड़ी कर सकती हैं। एम्स नई दिल्ली के विशेषज्ञों की ओर से स्कूली बच्चियों की सेहत को लेकर किए जा रहे अध्ययन की शुरुआती रिपोर्ट में हार्मोन से जुड़ी समस्याओं को लेकर चिंता सामने आई है। अध्ययन के शुरुआती आंकड़े क्या कहते हैं एम्स के विशेषज्ञ करीब 4,000 स्कूली बच्चियों पर अध्ययन कर रहे हैं। शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, हर 100 में करीब 3 से 8 किशोरियों में पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी PCOS की समस्या सामने आई है। वहीं वयस्क महिलाओं में यह आंकड़ा करीब 5 से 18 फीसदी तक बताया गया है यानी उम्र बढ़ने के साथ यह आंकड़ा और भी चिंताजनक हो सकता है। बदलती लाइफस्टाइल बन रही चिंता की वजह एम्स की पीडियाट्रिक एंडोक्राइनोलॉजिस्ट के मुताबिक, किशोरियों में हार्मोन से जुड़ी परेशानियां बढ़ने के पीछे बदलती जीवनशैली की भूमिका हो सकती है। ज़्यादा कैलोरी वाला खाना, मीठे और प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता सेवन, शारीरिक गतिविधि की कमी, तनाव और नींद का बिगड़ा हुआ पैटर्न समस्या को बढ़ा सकता है। स्क्रीन टाइम का सीधा असर आज बच्चों और किशोरों के बीच स्क्रीन टाइम काफी बढ़ गया है। पढ़ाई और मनोरंजन, दोनों के लिए मोबाइल और दूसरे गैजेट्स पर निर्भरता बढ़ने से शारीरिक गतिविधियां कम हो सकती हैं। ऐसे में खानपान और रोज़ाना की दिनचर्या पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी माना जा रहा है। यह भी पढ़ें:IND vs JPN T20 Match Report: बारिश से प्रभावित 5-5 ओवर के ऐतिहासिक मुकाबले में भारत ने जापान को 2 रन से हराया, अंतिम गेंद तक चला रोमांच PCOS सिर्फ एक वजह से नहीं होता एम्स के एनाटॉमी विभाग की विशेषज्ञ डॉ. रीमा दादा ने बताया कि PCOS को किसी एक कारण से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। इसमें आनुवंशिक कारणों के साथ बचपन की परिस्थितियां, हार्मोन, खानपान और जीवनशैली जैसे कई पहलू भूमिका निभा सकते हैं। यानी केवल मोबाइल चलाने या जंक फूड खाने को PCOS की एकमात्र वजह नहीं माना जा सकता कई कारक मिलकर इस समस्या का जोखिम बढ़ाते हैं, यही वजह है कि विशेषज्ञ किशोरियों की पूरी जीवनशैली पर ध्यान देने की सलाह देते हैं। स्क्रीन टाइम कम करने और एक्टिव रहने पर ज़ोर विशेषज्ञों के मुताबिक, अनियंत्रित स्क्रीन टाइम को कम करना, संतुलित और पौष्टिक भोजन लेना, तथा नियमित शारीरिक गतिविधि को दिनचर्या में शामिल करना फायदेमंद हो सकता है। डॉक्टर ने नियमित योग को भी उपयोगी बताया है। उनके अनुसार, योग और बेहतर जीवनशैली से अनियमित माहवारी जैसी समस्याओं को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि PCOS की स्थिति हर किशोरी में अलग हो सकती है, और इसके कारण भी अलग-अलग हो सकते हैं इसलिए किसी एक सामान्य समाधान की बजाय व्यक्तिगत मूल्यांकन ज़्यादा कारगर माना जाता है। माता-पिता के लिए क्यों अहम है यह अध्ययन एम्स की यह रिपोर्ट माता-पिता और स्कूलों दोनों के लिए एक चेतावनी की तरह है  किशोरावस्था में बनने वाली आदतें आगे चलकर लंबे समय तक सेहत पर असर डाल सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव करने से भविष्य में बड़ी स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) Q1: PCOS क्या है? पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, एक हार्मोनल समस्या जो महिलाओं और किशोरियों में माहवारी संबंधी अनियमितताओं का कारण बन सकती है। Q2: एम्स के अध्ययन में क्या पाया गया? हर 100 में से 3 से 8 किशोरियों में PCOS के लक्षण मिले, जबकि वयस्क महिलाओं में यह दर 5-18% तक है। Q3: PCOS के पीछे मुख्य कारण क्या हैं? आनुवंशिक कारण, बचपन की परिस्थितियां, हार्मोन, खानपान और जीवनशैली इनमें से कोई एक नहीं, बल्कि कई कारक मिलकर भूमिका निभाते हैं। Q4: स्क्रीन टाइम का PCOS से क्या संबंध है? बढ़ता स्क्रीन टाइम शारीरिक गतिविधि घटाता है, जो जीवनशैली से जुड़े जोखिम कारकों में से एक है। Q5: इससे बचाव के लिए क्या किया जा सकता है? संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, कम स्क्रीन टाइम, और योग को दिनचर्या में शामिल करना फायदेमंद हो सकता है। नोट: यह सामान्य स्वास्थ्य जानकारी है, चिकित्सीय सलाह नहीं। PCOS से जुड़े किसी भी लक्षण के लिए कृपया डॉक्टर से सलाह लें।

Pada Prasara पश्चिमोत्तानासन: पीठ की अकड़न से मिल सकती है राहत, जानिए पूरा तरीका

Pada Prasara पश्चिमोत्तानासन से पीठ दर्द में राहत

New Delhi: लंबे समय तक बैठकर काम करने से पीठ, कंधों और हैमस्ट्रिंग की मांसपेशियों में अकड़न महसूस होना आज के दौर में बेहद आम समस्या बन चुकी है। ऐसे में Pada Prasara पश्चिमोत्तानासन शरीर के लचीलेपन को बढ़ाने और मांसपेशियों में खिंचाव कम करने में मदद कर सकता है। Pada Prasara पश्चिमोत्तानासन क्या है आयुष मंत्रालय के अनुसार, यह एक बैठकर किया जाने वाला योगासन है, जिसे सामान्य पश्चिमोत्तानासन का एक उन्नत रूप माना जाता है। इसमें दोनों पैरों को फैलाकर आगे की ओर झुका जाता है। इस दौरान हैमस्ट्रिंग के साथ-साथ अंदरूनी जांघों, ग्रोइन और पीठ की मांसपेशियों पर भी खिंचाव पड़ता है यानी यह एक साथ शरीर के कई हिस्सों को टारगेट करता है। किन लोगों के लिए है खासतौर पर फायदेमंद लगातार बैठे रहने या गलत पोस्चर के कारण अंदरूनी जांघों की मांसपेशियां टाइट हो सकती हैं। Pada Prasara पश्चिमोत्तानासन के नियमित अभ्यास से इन मांसपेशियों में लचीलापन बढ़ाने में मदद मिल सकती है। यह खासतौर पर उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है जो लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं या नियमित रूप से रनिंग, साइकिलिंग और जिम जैसी गतिविधियां करते हैं  क्योंकि इन गतिविधियों में भी हैमस्ट्रिंग और जांघों पर काफी दबाव पड़ता है। यह भी पढ़ें:Mark Wood टरनेशनल क्रिकेट संन्यास: इंग्लैंड के तेज़ गेंदबाज़ ने चोटों से हारकर लिया बड़ा फैसला अभ्यास करते समय किन बातों का रखें ध्यान इस आसन का अभ्यास करते समय शरीर को जबरदस्ती नीचे झुकाने से बचना चाहिए। शुरुआत में अपनी क्षमता के अनुसार ही आगे झुकें और धीरे-धीरे लचीलापन बढ़ाएं। किसी तरह का तेज दर्द महसूस होने पर तुरंत अभ्यास रोक देना चाहिए  योग में धैर्य और नियमितता ही असली फायदा दिलाती है, जल्दबाज़ी नुकसान पहुंचा सकती है। किन्हें बरतनी चाहिए विशेष सावधानी जिन लोगों को स्लिप डिस्क, साइटिका या पीठ के निचले हिस्से में गंभीर दर्द है, उन्हें यह आसन करने से पहले विशेषज्ञ या योग प्रशिक्षक की सलाह लेनी चाहिए। बिना सही मार्गदर्शन के इस तरह के खिंचाव वाले आसन करना कई बार समस्या को और बढ़ा सकता है, इसलिए सावधानी बरतना ज़रूरी है। रोज़मर्रा की दिनचर्या में कैसे शामिल करें विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर यह आसन सुबह या शाम के समय हल्के वार्मअप के बाद नियमित रूप से किया जाए, तो यह डेस्क जॉब करने वालों के लिए एक असरदार आदत बन सकती है। इसे हफ्ते में कम से कम 3-4 बार अभ्यास में लाने से समय के साथ पीठ और हैमस्ट्रिंग की अकड़न में ध्यान देने लायक फर्क महसूस हो सकता है। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) Q1: Pada Prasara पश्चिमोत्तानासन किन मांसपेशियों को फायदा पहुंचाता है? हैमस्ट्रिंग, अंदरूनी जांघों, ग्रोइन और पीठ की मांसपेशियों को। Q2: यह आसन किनके लिए सबसे ज़्यादा उपयोगी है? लंबे समय तक बैठकर काम करने वालों और रनिंग, साइकिलिंग, जिम जैसी गतिविधियाँ करने वालों के लिए। Q3: इस आसन को करते समय क्या सावधानी बरतनी चाहिए? शरीर को जबरदस्ती न झुकाएं, धीरे-धीरे लचीलापन बढ़ाएं, और तेज दर्द होने पर तुरंत रुक जाएं। Q4: किन्हें यह आसन करने से पहले सलाह लेनी चाहिए? जिन्हें स्लिप डिस्क, साइटिका या पीठ के निचले हिस्से में गंभीर दर्द है। Q5: इसे कितनी बार अभ्यास में लाना चाहिए? विशेषज्ञों के मुताबिक हफ्ते में कम से कम 3-4 बार, नियमितता के साथ। नोट: यह सामान्य जानकारी है, चिकित्सीय सलाह नहीं। किसी भी नए योगासन को शुरू करने से पहले, खासकर अगर आपको पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या है, तो कृपया विशेषज्ञ या योग प्रशिक्षक से सलाह लें।

स्वस्थ भारत Developed भारत: Health Conclave में बोले केंद्रीय मंत्री Mansukh Mandaviya

स्वस्थ भारत Developed भारत: Mansukh Mandaviya का बड़ा बयान

New Delhi: केंद्रीय श्रम, युवा मामले एवं खेल मंत्री Mansukh Mandaviya ने एक दिन तक चले हेल्थ कॉनक्लेव में कहा कि 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने के लक्ष्य के लिए एक स्वस्थ आबादी होना बेहद जरूरी है। उनके इस बयान ने देश में रोकथाम आधारित स्वास्थ्य देखभाल के बारे में बहस को नई दिशा दी है। कार्यक्रम की थीम क्या रही इस कॉनक्लेव की थीम “कॉनवर्सेशन्स फॉर ए हेल्दी टूमोरो: प्रिवेंशन इज बेटर थन क्यूर” रही। इसमें देश के विभिन्न हिस्सों से नीति बनाने वाले, स्वास्थ्य के विशेषज्ञ, अस्पताल प्रबंधक, डॉक्टर और अलग-अलग क्षेत्रों के मुख्य लोग एक मंच पर आए। पूरे दिन रोकथामी स्वास्थ्य, सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति, सामान्य लोगों तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और बदलते चिकित्सा दुनिया के हालात पर गहरी चर्चा हुई। कोविड का अनुभव एक मॉडल के रूप में Mandaviya ने अपने भाषण में भारत के कोविड-19 प्रबंधन का विस्तार से जिक्र किया। उन्होंने बताया कि महामारी के दौरान भारत ने जैसे टीकाकरण अभियान चलाया और स्वास्थ्य संकट को संभाला, उसकी सराहना बिल गेट्स जैसे वैश्विक लोगों ने की थी। मांडविया के मुताबिक, यह अनुभव इस बात का सबूत है कि भारत अपनी ताकत, संस्कृति और परंपराओं पर आधारित मॉडल से स्वास्थ्य सेवाओं को आगे बढ़ा सकता है। ये भी पढ़ें-West Bengal SIR क्या है? वोटर लिस्ट रिवीज़न का पूरा विवाद, आंकड़े और अब तक क्या हुआ – पूरी कहानी रोकथामी स्वास्थ्य पर जोर क्यों दिया जा रहा है भारत जैसे बड़े देश में रोकथाम पर ज्यादा ध्यान देना आर्थिक और व्यावहारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर बीमारियां शुरुआत में ही रोक ली जाएं, तो इलाज की लागत और लंबे समय में स्वास्थ्य प्रणाली पर दबाव दोनों कम हो जाता है। इसी वजह से अब “रोकथाम बेहतर है इलाज से” जैसी थीम पर ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है। नकली दवाओं और उनकी गुणवत्ता पर बात कार्यक्रम में दिल्ली के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ. पंकज कुमार सिंह ने नकली दवाओं पर रोक लगाने और उनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने की बात की। इस समस्या का महत्व इसलिए है क्योंकि देश में लंबे समय से नकली और घटिया दवाओं के मामले स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए चुनौती बने हुए हैं। आयुष्मान भारत की भूमिका पर चर्चा सांसद महेश शर्मा ने बताया कि मोदी सरकार की आयुष्मान भारत योजना ने आम लोगों, विशेषकर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने इस योजना के दायरे को बढ़ाने पर भी जोर दिया। लिवर स्वास्थ्य और आयुर्वेद पर विशेष सत्र जाने-माने हेपेटोलॉजिस्ट डॉ. एस.के. सरीन ने लिवर से जुड़ी बीमारियों की रोकथाम और शुरुआती जांच के महत्व पर बात की, क्योंकि ये बीमारियां बिना लक्षण दिखाए बढ़ती रहती हैं। वहीं पतंजलि आयुर्वेद के प्रबंध निदेशक आचार्य बालकृष्ण ने आयुर्वेद और योग के साथ बढ़ती पहचान पर बात की और इनके लिए बेहतर पहुंच, अधिक वैज्ञानिक अनुसंधान और स्वास्थ्य बीमा में शामिल किए जाने की मांग की। कार्यक्रम का उद्देश्य आयोजकों ने बताया कि इस तरह के कॉनक्लेव के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों के साथ बातचीत को एक मंच पर लाया जाता है, ताकि नीति बनाने वालों, डॉक्टरों और आम लोगों के बीच संवाद बेहतर हो सके। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि स्वास्थ्य की परिभाषा बदल रही है। अब इसका मकसद बीमारी के इलाज करना नहीं रहा, बल्कि लोगों को बीमार होने से पहले ही सही फैसले करने में सक्षम बनाना है। मुख्य बिंदु Mansukh Mandaviya ने कहा कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य के लिए एक स्वस्थ आबादी बुनियादी है। कार्यक्रम की थीम रही “रोकथाम बेहतर है इलाज से”। कोविड के प्रबंधन को एक सफल भारतीय मॉडल के रूप में पेश किया गया। नकली दवाओं, आयुष्मान भारत, लिवर स्वास्थ्य और आयुर्वेद पर अलग-अलग सत्र हुए। विशेषज्ञों ने आयुर्वेद के लिए बेहतर बीमा और अनुसंधान की मांग की। कॉनक्लेव का फोकस रहा रोकथाम आधारित स्वास्थ्य और बेहतर पहुंच। अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs) Q1:  Mandaviya ने क्या संदेश दिया? 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए एक स्वस्थ आबादी बुनियादी है। Q2: कार्यक्रम की थीम क्या रही? “कॉनवर्सेशन्स फॉर ए हेल्दी टूमोरो: प्रिवेंशन इज बेटर थन क्यूर”। Q3: किन अन्य नेताओं और विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया? डॉ. पंकज कुमार सिंह, सांसद महेश शर्मा, डॉ. एस.के. सरीन और आचार्य बालकृष्ण ने हिस्सा लिया। Q4: कोविड-19 के बारे में बात क्यों की गई? Mansukh Mandaviya ने भारत के कोविड-19 प्रबंधन मॉडल को एक उदाहरण के रूप में पेश किया, जिसकी बिल गेट्स ने भी सराहना की थी। Q5: इस कॉनक्लेव का मुख्य फोकस क्या रहा? रोकथाम आधारित स्वास्थ्य, नकली दवाओं पर रोक, आयुष्मान भारत का विस्तार और आयुर्वेद और योग को मुख्यधारा में लाना।

Mental Health Alert:थकने के बाद भी आराम न कर पाना खतरनाक! जानिए क्यों जरूरी है Mental Break लेना

Break लेने से डर क्यों? जानिए क्यों जरूरी है Mental Rest

New Delhi: आज की fast-paced life में लगातार काम करना, busy रहना और हर वक्त productive बने रहना success का benchmark बन चुका है। लेकिन क्या आपने कभी notice किया है कि जब आप दिन-भर की exhaustion के बाद थोड़ी देर relax करने बैठते हैं, तो mind में अजीब सी restlessness या mental rest महसूस होने लगती है? ऐसा लगता है जैसे break लेकर आप कोई बहुत बड़ा loss कर रहे हैं या laziness दिखा रहे हैं। Mental Health Experts और Psychotherapists के मुताबिक, extreme fatigue के बावजूद break न ले पाना और rest करने पर खुद को guilty महसूस करना Toxic Productivity और Burnout का एक बड़ा sign है। यह भी पढ़ें:Gautam Adani vs Zhang Yiming: अडानी को पीछे छोड़ कैसे एशिया के सबसे अमीर शख्स बने बाइटडांस के फाउंडर? क्यों महसूस होता है ‘Rest Guilt’? Toxic Productivity Culture: आज के दौर में society ने यह mindset बना दिया है कि अगर आप हर वक्त hustle नहीं कर रहे, तो आप अपना time waste कर रहे हैं। यही thinking दिमाग में continuous pressure पैदा करती है। Self-Worth vs Output: कई लोग अपनी self-worth और value सिर्फ इस बात से attach कर लेते हैं कि उन्होंने दिन भर में कितना task complete किया। जैसे ही productivity रुकती है, उनका confidence low होने लगता है। The ‘Earned Rest’ Trap: ज्यादातर लोग मानते हैं कि rest कोई ऐसी चीज़ है जिसे hard work करके earn करना पड़ता है। चूंकि work कभी पूरी तरह finish नहीं होता, इसलिए relax करने का time कभी नहीं आता। Nervous System in Overdrive: जब आप लंबे समय तक stress और heavy workload में रहते हैं, तो आपका nervous system ‘fight-or-flight’ mode में रहता है। ऐसे में अचानक idle बैठना brain को uncomfortable महसूस कराता है। Rest करना Weakness नहीं, Priority है Psychotherapists का मानना है कि rest कोई reward नहीं है जिसके लिए आपको खुद को exhaust करना पड़े, बल्कि यह शरीर और mind की basic human need है। जिस तरह mobile battery drain होने पर phone को recharge करना पड़ता है, ठीक वैसे ही optimal performance के लिए mental health का recharge होना जरूरी है। ‘Rest Guilt’ Overcome करने के 3 Effective Tips: Schedule Your Break: अपने daily routine में meetings की तरह relaxation time का भी एक fixed slot book करें। Reframe Your Mindset: खुद को याद दिलाएं कि आपकी identity सिर्फ आपके work deliverables या achievements से तय नहीं होती। Digital Detox: Break के दौरान screen time कम करें ताकि mind बिना distractions के सही मायने में recover कर सके।