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West Bengal SIR: 37 लाख से ज़्यादा अपीलें Tribunals में अटकीं, नगरपालिका चुनाव नज़दीक

New Delhi: पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची Special Intensive Revision (SIR) से जुड़ा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है चुनाव आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि राज्य में 37 लाख से ज़्यादा अपीलें अभी भी ट्राइब्यूनल्स में लंबित हैं, और यह सब ऐसे समय हो रहा

West Bengal SIR: 37 लाख अपीलें Tribunals में अटकीं

New Delhi: पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची Special Intensive Revision (SIR) से जुड़ा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है  चुनाव आयोग (ECI) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि राज्य में 37 लाख से ज़्यादा अपीलें अभी भी ट्राइब्यूनल्स में लंबित हैं, और यह सब ऐसे समय हो रहा है जब राज्य में नगरपालिका चुनाव नज़दीक आ रहे हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं

चुनाव आयोग के हलफनामे के मुताबिक, SIR प्रक्रिया के दौरान 24 ज़िलों में कुल 38.20 लाख अपीलें दाखिल की गई थीं  ये अपीलें वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने या हटाने से जुड़ी शिकायतों और अनुरोधों से संबंधित हैं। इनमें से सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त ट्राइब्यूनल्स अब तक सिर्फ करीब 1.02 लाख मामलों का ही निपटारा कर पाए हैं  यानी 37 लाख से ज़्यादा अपीलें अभी भी अटकी हुई हैं।

सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला

यह मुद्दा जुलाई में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जब मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने पश्चिम बंगाल कांग्रेस की SIR कमेटी के अध्यक्ष प्रसेनजीत बोस की याचिका पर सुनवाई शुरू की। याचिका में विधानसभा क्षेत्र-वार आंकड़े सार्वजनिक करने की मांग की गई थी, ताकि यह पता चल सके कि SIR के दौरान हटाए गए मतदाताओं ने कितने दावे और आपत्तियां दर्ज कराईं।

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58 लाख से ज़्यादा मतदाता हटाए गए थे

बोस की याचिका के मुताबिक, SIR की एन्युमरेशन (गणना) प्रक्रिया के दौरान 58 लाख से ज़्यादा मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए थे। इसके बाद दावे और आपत्ति के चरण में 9.64 लाख inclusion आवेदन (Form 6 और 6A) और 99,000 से ज़्यादा deletion आवेदन (Form 7) प्राप्त हुए  लेकिन 28 फरवरी को प्रकाशित अंतिम वोटर लिस्ट में सिर्फ करीब 1.82 लाख नाम ही वापस जोड़े जा सके।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख

25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि वह ट्राइब्यूनल्स में लंबित और निपटाई गई अपीलों का पूरा डेटा जमा करे। कोर्ट ने साफ कहा कि इन मामलों का निपटारा तय समय-सीमा के भीतर होना चाहिए, और आयोग से यह भी पूछा कि लंबित अपीलों को तेज़ी से निपटाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं, और कितने अतिरिक्त ट्राइब्यूनल्स की ज़रूरत है।

ज़िलों के बीच भी बड़ा अंतर

चुनाव आयोग के आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि अलग-अलग ज़िलों में अपीलों के निपटारे की रफ्तार में काफी अंतर है  कुछ ज़िलों में मामलों का निपटारा अपेक्षाकृत तेज़ी से हो रहा है, जबकि कुछ में स्थिति अभी भी काफी पीछे है। हालांकि, आयोग के जवाब में यह स्पष्ट ब्रेकअप नहीं दिया गया कि कितनी अपीलें नाम हटाए जाने के खिलाफ हैं, और कितनी नाम शामिल करने के खिलाफ।

नगरपालिका चुनावों के लिए क्यों है यह चिंता का विषय

यह भारी बैकलॉग ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम बंगाल आगामी नगरपालिका चुनावों की तैयारी कर रहा है। लाखों मतदाता अभी भी अपनी अपीलों पर फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं, जबकि चुनाव प्राधिकरण और ट्राइब्यूनल्स के सामने इतने बड़े पैमाने पर मामलों को निपटाने की चुनौती है। सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही अब पारदर्शिता, समयबद्ध निपटारे और योग्य मतदाताओं के अधिकारों की सुरक्षा पर केंद्रित हो गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: पश्चिम बंगाल में कुल कितनी अपीलें दाखिल हुई थीं?
38.20 लाख, जिनमें से सिर्फ 1.02 लाख का ही निपटारा हो पाया है।

Q2: सुप्रीम कोर्ट में यह मामला किसने उठाया?
प्रसेनजीत बोस, जो पश्चिम बंगाल कांग्रेस की SIR कमेटी के अध्यक्ष हैं।

Q3: SIR के दौरान कितने मतदाता हटाए गए थे?
58 लाख से ज़्यादा, एन्युमरेशन चरण के दौरान।

Q4: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को क्या निर्देश दिया?
लंबित और निपटाई गई अपीलों का पूरा डेटा जमा करने और तेज़ी से निपटारे के लिए कदम बताने का।

Q5: यह मुद्दा अभी क्यों अहम है?
क्योंकि पश्चिम बंगाल में नगरपालिका चुनाव नज़दीक हैं, और लाखों मतदाता अभी भी अपनी अपीलों पर फैसले का इंतज़ार कर रहे हैं।

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