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SIR विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा: CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ PIL, दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों पर उठे सवाल

देशभर में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision यानी SIR) को लेकर पहले से चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है, जिसमें SIR प्रक्रिया के दौरान

SIR विवाद, CEC ज्ञानेश

देशभर में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision यानी SIR) को लेकर पहले से चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट तक पहुंच गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई है, जिसमें SIR प्रक्रिया के दौरान लिए गए कुछ फैसलों को चुनौती दी गई है।

यह याचिका अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने अधिवक्ता चांद कुरैशी के माध्यम से संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की है। याचिका का आधार द इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट को बताया गया है, जिसमें दावा किया गया था कि दो चुनाव आयुक्तों ने SIR से जुड़े कुछ निर्णयों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कराई थीं।

यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें चुनाव आयोग के आंतरिक निर्णय-प्रक्रिया, मतदाता सूचियों की विश्वसनीयता और संवैधानिक संस्था के रूप में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, याचिका में लगाए गए आरोप अभी अदालत में साबित नहीं हुए हैं और इन्हें प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

क्या है पूरा मामला?

चुनाव आयोग ने देशभर के मतदाता रोल का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) शुरू किया था, जिसका मकसद मतदाता सूचियों को अद्यतन और शुद्ध करना बताया गया। इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में नाम मतदाता सूची से हटाए गए और नए आवेदन जोड़े गए, जिसे लेकर विभिन्न राज्यों में विपक्षी दल पहले से सवाल उठाते रहे हैं।

23 सितंबर 2026 को द इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें दावा किया गया कि नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच लगभग 10 महीनों की अवधि में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े कुछ निर्णयों पर कम से कम 14 बार लिखित आपत्तियां या असहमति दर्ज कराई, जिनमें एक ही दिन में चार बार आपत्ति दर्ज कराने का भी दावा शामिल है। इसी रिपोर्ट के सामने आने के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई और कुछ ही दिनों में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी गई।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी द्वारा दाखिल इस PIL में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है। यह स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है कि याचिका दाखिल होने का मतलब यह नहीं है कि अदालत ने इसमें लगाए गए आरोपों को स्वीकार कर लिया है या किसी को दोषी ठहराया है। अभी तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से कोई अंतिम आदेश जारी नहीं हुआ है। याचिका पर सुनवाई की तारीख और अदालत का रुख आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।

इसके अलावा एक अन्य घटनाक्रम में, अधिवक्ता ब्रजेश सिंह ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी को पत्र लिखकर CEC के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने की सहमति मांगी है। यह अलग प्रक्रिया है और इसे सीधे सुप्रीम कोर्ट में दाखिल PIL के समान नहीं समझा जाना चाहिए।

याचिका में क्या आरोप लगाए गए हैं?

याचिकाकर्ता का आरोप है कि कुछ फैसले “चुनाव आयोग” के नाम पर लिए गए, लेकिन इनमें अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति नहीं ली गई। रिपोर्ट के अनुसार, याचिका में निम्नलिखित प्रमुख आरोप शामिल हैं:

  • याचिका में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने Form 6 में बदलाव, इलेक्टोरल-रोल डेटाबेस के केंद्रीकरण, ECINet प्रणाली के जरिए योग्य मतदाताओं को बहाल न किए जाने और पश्चिम बंगाल में लगभग 16.1 लाख अपीलें दाखिल किए जाने जैसे मुद्दों पर आपत्तियां दर्ज कराई थीं।
  • याचिका में कहा गया है कि मई 2026 में Form 6 में बदलाव को लेकर चुनाव आयुक्त जोशी ने आपत्ति जताई थी और तर्क दिया था कि सांविधिक फॉर्म में बदलाव बिना संबंधित नियमों में संशोधन के नहीं किया जा सकता, जिससे संधू ने भी सहमति जताई थी। याचिका का आरोप है कि इसके बावजूद ECINet पोर्टल पर फॉर्म में बदलाव कर दिया गया।
  • याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया है कि CEC द्वारा लिए गए कुछ निर्णय, दिशानिर्देश और सॉफ्टवेयर में बदलाव बहुमत की राय के विपरीत लिए गए, जो चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 18 का उल्लंघन बताया गया है, जिसमें असहमति की स्थिति में बहुमत की राय से निर्णय लेने का प्रावधान है।

यह सभी बिंदु याचिकाकर्ता के दावे हैं, जिनकी जांच और सत्यापन अदालत में होना बाकी है।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की गई?

याचिका में निम्नलिखित प्रमुख राहतें मांगी गई हैं:

  • CEC द्वारा बिना पूर्ण आयोग की सहमति के लिए गए फैसलों, दिशानिर्देशों और सॉफ्टवेयर बदलावों को असंवैधानिक और शून्य (void ab initio) घोषित करने की मांग
  • SIR के दौरान करीब 13 करोड़ नामों के कथित रूप से हटाए जाने की स्वतंत्र जांच के लिए रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में न्यायिक जांच आयोग या विशेष जांच दल (SIT) के गठन की मांग, जिसमें साइबर सुरक्षा और IT विशेषज्ञों को भी शामिल करने की बात कही गई है
  • मूल सांविधिक Form 6 (रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 के तहत निर्धारित) को बहाल करने और पात्र वयस्कों को मौजूदा कानून के अनुसार मतदाता के रूप में पंजीकरण की अनुमति देने की मांग
  • जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत CEC ज्ञानेश कुमार, उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग, आयोग की IT प्रमुख सीमा खन्ना और अन्य संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अभियोजन शुरू करने की मांग
  • याचिका में यह भी कहा गया है कि CEC की कथित भूमिका उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे से बाहर है, इसलिए उन्हें कानूनी संरक्षण (immunity) का लाभ नहीं मिलना चाहिए

ये सभी मांगें याचिकाकर्ता की ओर से रखी गई हैं और इन पर अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट को लेना है।

ECI का क्या कहना है?

यह खंड समझना बेहद जरूरी है। चुनाव आयोग ने इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लिखित नोट, अवलोकन, तकनीकी सुझाव और आंतरिक जांच-परख आयोग के भीतर सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। आयोग का कहना है कि उसकी सभी कार्रवाइयां कानून के अनुसार हुई हैं और निर्णय-प्रक्रिया के दौरान विचारों में भिन्नता होना सामान्य बात है। ETV Bharat

रिपोर्ट्स के अनुसार, ECI अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि SIR से जुड़े आदेश, जिनमें Form 6, Form 8 और नागरिकता घोषणा से संबंधित प्रावधान शामिल हैं, CEC और दोनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति से पारित किए गए थे। यानी ECI ने इन दावों के विपरीत कहा है कि अंतिम निर्णय बिना आयुक्तों की सहमति के नहीं लिए गए। आयोग के अनुसार, किसी व्यक्तिगत असहमति या सुझाव का दर्ज होना और आयोग के अंतिम निर्णय पर औपचारिक विरोध होना, दोनों अलग-अलग बातें हैं और इन्हें एक जैसा नहीं समझा जाना चाहिए।

दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियां क्या थीं?

रिपोर्ट्स के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने जिन मुद्दों पर आपत्ति जताई थी, उनमें मुख्य रूप से ये विषय शामिल बताए गए हैं:

  • Form 6 में बदलाव, जिसमें नए मतदाताओं के लिए “पूर्वज संबंधी शर्त” (ancestral condition) जोड़े जाने का दावा किया गया है
  • मतदाता सूचियों से नाम जोड़ने-हटाने और बहाल करने से जुड़ी प्रक्रियाएं
  • इलेक्टोरल-रोल डेटाबेस का केंद्रीकरण
  • पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में अपीलें दाखिल किए जाने का मामला

यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह सभी बिंदु मीडिया रिपोर्ट और याचिका में उल्लिखित दावे हैं। किसी एक आपत्ति के आधार पर पूरी SIR प्रक्रिया को अवैध या गलत मान लेना उचित नहीं होगा, क्योंकि आयोग के भीतर तकनीकी सुझाव और असहमति का दर्ज होना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।

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13 करोड़ वोटरों वाला दावा क्या है?

यह आंकड़ा इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा में है, इसलिए इसे अलग से स्पष्ट करना जरूरी है। रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि SIR प्रक्रिया के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल से करीब 13 करोड़ नाम हटाए गए। याचिका में इसी आंकड़े के आधार पर स्वतंत्र जांच की मांग की गई है।

यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह आंकड़ा ड्राफ्ट सूची से हटाए गए नामों का है, न कि यह स्वतः प्रमाणित तथ्य है कि 13 करोड़ वास्तविक (genuine) मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए। याचिकाकर्ता का आरोप है कि इस आंकड़े की जांच जरूरी है, लेकिन इसका स्वतंत्र और आधिकारिक सत्यापन अभी सामने नहीं आया है। ECI ने इस दावे की व्याख्या पर सीधे तौर पर सवाल उठाए हैं और कहा है कि SIR से जुड़े निर्णय कानून के दायरे में और सामूहिक सहमति से लिए गए। इसलिए इस आंकड़े को अभी केवल याचिकाकर्ता की मांग/आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए, स्थापित तथ्य के रूप में नहीं।

SIR क्या है?

Special Intensive Revision (SIR) चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण है। इसका मकसद मतदाता सूची को अद्यतन करना, मृत या स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं के नाम हटाना, दोहरे नामों को समाप्त करना और नए पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना है। यह प्रक्रिया आमतौर पर बूथ स्तर के अधिकारियों के जरिए घर-घर सत्यापन के आधार पर चलाई जाती है। मतदाता सूची की शुद्धता स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए बुनियादी शर्त मानी जाती है, इसलिए इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और सटीकता को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

Form 6 क्या है और विवाद क्यों है?

Form 6, रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 के तहत वह सांविधिक फॉर्म है जिसका इस्तेमाल कोई भी पात्र नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम जुड़वाने के लिए करता है। याचिका के अनुसार, ECINet पोर्टल पर इस फॉर्म में ऐसे प्रश्न जोड़े गए जो आवेदकों या उनके परिजनों को पिछले SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची से जोड़ते हैं। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह बदलाव चुनाव आयुक्तों की आपत्ति के बावजूद किया गया। याचिका में मांग की गई है कि मूल सांविधिक Form 6 को बहाल किया जाए, ताकि नए पात्र मतदाता बिना अतिरिक्त शर्तों के पंजीकरण करा सकें। यह भी स्पष्ट रहे कि इस बदलाव और इसकी वैधता पर अंतिम फैसला अदालत को करना है।

इस विवाद का राजनीतिक असर क्या है?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट सामने आने के बाद से विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर सरकार और चुनाव आयोग को घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस रिपोर्ट के बाद CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की और चुनाव आयोग के मतदाता सूची प्रबंधन पर सवाल उठाए। कुछ अन्य विपक्षी नेताओं ने भी इस मसले पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। वहीं, चुनाव आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि आंतरिक असहमति दर्ज होना निर्णय-प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है।

यह स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि किसी भी राजनीतिक दल की प्रतिक्रिया या मांग को इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि आरोप सही हैं या किसी पक्ष की तरफ से कोई गलती हुई है। यह मामला फिलहाल अदालत के समक्ष विचाराधीन है।

अब आगे क्या होगा?

याचिका दाखिल होने के बाद अब सामान्य प्रक्रिया के तहत यह देखा जाना बाकी है कि सुप्रीम कोर्ट इसे कब सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करता है। अदालत संबंधित पक्षों — चुनाव आयोग और अन्य प्रतिवादियों — से जवाब मांग सकती है। इसके बाद दस्तावेजी साक्ष्यों और तथ्यों की जांच की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। हालांकि, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख या फैसला क्या होगा, इसका अनुमान अभी नहीं लगाया जा सकता। यह पूरी तरह अदालत की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों पर निर्भर करेगा।

Key Takeaways

  • CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक PIL दाखिल की गई है, जिसमें SIR से जुड़े कुछ फैसलों को चुनौती दी गई है
  • याचिका का आधार इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट को बताया गया है, जिसमें दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों का जिक्र है
  • याचिका में 13 करोड़ नामों के हटाए जाने की स्वतंत्र जांच, Form 6 की बहाली और कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है
  • चुनाव आयोग ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि सभी SIR-संबंधी अंतिम निर्णय दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे
  • अदालत ने अभी तक इस मामले में कोई अंतिम आदेश जारी नहीं किया है; याचिका के आरोप न्यायिक जांच के अधीन हैं

FAQs

Q1. SIR विवाद क्या है?
यह विवाद चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया और इस दौरान लिए गए कुछ निर्णयों को लेकर है, जिन पर सवाल उठाए गए हैं।

Q2. CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ PIL क्यों दाखिल हुई?
याचिकाकर्ता का आरोप है कि SIR से जुड़े कुछ फैसले बिना अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के लिए गए। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की गई है।

Q3. क्या सुप्रीम कोर्ट ने CEC को दोषी ठहराया है?
नहीं। याचिका दाखिल होना किसी को दोषी ठहराए जाने के समान नहीं है। अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई अंतिम आदेश या टिप्पणी जारी नहीं की है। आरोपों की सच्चाई अदालत में सुनवाई के बाद ही तय होगी।

Q4. दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियां किस बारे में थीं?
रिपोर्ट्स के अनुसार यह आपत्तियां Form 6 में बदलाव, इलेक्टोरल-रोल डेटाबेस के केंद्रीकरण, मतदाताओं की बहाली और पश्चिम बंगाल में अपीलों से जुड़े मुद्दों पर बताई गई हैं।

Q5. 13 करोड़ वोटरों वाला दावा क्या है?
यह दावा याचिकाकर्ता की ओर से रखा गया आंकड़ा है, जो SIR के दौरान ड्राफ्ट सूची से हटाए गए नामों से जुड़ा है। इसे स्वतंत्र जांच की मांग के तौर पर पेश किया गया है, प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं।

Q6. Form 6 का SIR विवाद से क्या संबंध है?
Form 6 मतदाता पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाला सांविधिक फॉर्म है। याचिका में आरोप है कि इसमें बिना नियमों में संशोधन के अतिरिक्त शर्तें जोड़ी गईं, जिसकी बहाली की मांग की गई है।

Q7. ECI ने इन आरोपों पर क्या कहा है?
चुनाव आयोग ने कहा है कि आंतरिक नोट और असहमति दर्ज होना सामान्य प्रक्रिया है, और SIR से जुड़े सभी अंतिम निर्णय दोनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से लिए गए थे।

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