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France Protest: स्कूलों से उठी चिंगारी, देशभर में प्रदर्शन, फ्रांस में क्यों सड़कों पर उतरे लोग?

New Delhi: फ्रांस इस वक्त अपने सबसे बड़े सामाजिक आंदोलनों में से एक से गुजर रहा है। इसकी शुरुआत स्कूलों की हालत को लेकर छात्रों के छोटे प्रदर्शन से हुई थी। अब ये महंगाई, असमानता और सरकारी नीतियों के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन बन चुका है। 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों

France Protest: स्कूलों से उठी चिंगारी, देशभर में प्रदर्शन, फ्रांस में क्यों सड़कों पर उतरे लोग?

New Delhi: फ्रांस इस वक्त अपने सबसे बड़े सामाजिक आंदोलनों में से एक से गुजर रहा है। इसकी शुरुआत स्कूलों की हालत को लेकर छात्रों के छोटे प्रदर्शन से हुई थी। अब ये महंगाई, असमानता और सरकारी नीतियों के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन बन चुका है। 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों में लिमोगेस का 143 साल पुराना ऐतिहासिक टाउन हॉल आग में बुरी तरह तबाह हो गया। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि ये सब क्यों हो रहा है।

France Protest की शुरुआत स्कूलों से हुई

पिछले महीने पेरिस के गरीब उत्तरी इलाकों के हाई स्कूलों (लिसे) में छात्रों ने प्रदर्शन शुरू किया। उनकी शिकायतें सीधी थीं। विकिपीडिया के मुताबिक, छात्रों ने शिक्षकों की कमी, भरी हुई कक्षाएं, पुरानी इमारतें और थकाने वाले टाइमटेबल का मुद्दा उठाया। यूनिवर्सिटी एडमिशन वेबसाइट Parcoursup से जुड़ा तनाव भी एक वजह बताया गया। गर्मी की लहर में कुछ कक्षाओं का तापमान 40°C तक पहुंचने की बात भी सामने आई।

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छोटा मुद्दा बड़ा क्यों बन गया

Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूलों की नाराजगी धीरे-धीरे असमानता, सरकारी खर्च और रहन-सहन की लागत के बड़े सवालों में बदल गई। यानी बात सिर्फ स्कूल की नहीं रही। लोगों को लगने लगा कि सरकार आम लोगों की परेशानियों पर ध्यान नहीं दे रही।

महंगाई और ईंधन के दाम

इस आंदोलन में महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा है। ईंधन और रोजमर्रा की चीजों के बढ़ते दाम से लोग परेशान हैं। विकिपीडिया के मुताबिक, महंगाई की एक वजह मध्य-पूर्व का युद्ध भी है। ट्रक चालक और किसान भी डीजल के ऊंचे दामों पर विरोध और हड़ताल कर रहे हैं। प्रदर्शनकारी सार्वजनिक सेवाओं में कटौती का भी विरोध कर रहे हैं।

येलो वेस्ट्स की वापसी

17 अक्टूबर के प्रदर्शन में “येलो वेस्ट्स” आंदोलन के पुराने कार्यकर्ता भी शामिल हुए। ये वही आंदोलन है जिसने 2018 में महंगाई के खिलाफ फ्रांस को हिला दिया था। इस बार इनके साथ छात्र, शिक्षक, ट्रेड यूनियन, किसान, पर्यावरण कार्यकर्ता और रिटायर्ड लोग भी आए। Al Jazeera के मुताबिक, पेरिस और दूसरे शहरों में 5 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे।

हिंसा कैसे भड़की

दिन में ज्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे। रात होते-होते कई शहरों में हिंसा भड़क गई। पेरिस में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं और आंसू गैस का इस्तेमाल हुआ।

लिमोगेस में नकाबपोश लोगों ने पहले पुलिस कार जलाई, फिर खिड़कियां तोड़कर टाउन हॉल में घुसे और आग लगा दी। मार्सिले में सिटी हॉल में तोड़फोड़ हुई और लियों में पर्यटन कार्यालय जलाया गया। CNN के मुताबिक, कुल करीब 1,800 लोग हिरासत में लिए गए। रिपोर्ट में एक प्रदर्शनकारी की मौत और 500 से ज्यादा पुलिसकर्मियों के घायल होने की बात भी कही गई है।

प्रदर्शनकारियों का पक्ष

पेरिस की 19 साल की एक प्रदर्शनकारी ने कहा कि वे महंगाई, ईंधन के दाम और छात्रों के साथ हिंसा के खिलाफ लड़ रहे हैं। उसके मुताबिक, छात्रों को शिक्षक और बेहतर पढ़ाई का माहौल मांगने पर चोट पहुंचाई जा रही है। ये प्रदर्शनकारी का अपना दावा है।

सरकार का रुख

राष्ट्रपति मैक्रों ने हिंसा करने वालों को “अराजकता फैलाने वाले” बताया और कहा कि तोड़फोड़ और लूटपाट करने वालों पर कार्रवाई होगी। फ्रांस सरकार का आरोप है कि अति-वामपंथी समूह राजनीतिक फायदे के लिए हालात भड़का रहे हैं। ये सरकार का आरोप है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।

दूसरी तरफ, कई मेयर और नेता सरकार की कानून-व्यवस्था की योजना की आलोचना कर रहे हैं। प्रधानमंत्री सेबास्तियां लेकोर्नू पेरिस, लियों और मार्सिले के मेयरों से मिलने वाले हैं।

आगे क्या हो सकता है

नुकसान का आकलन अभी जारी है। आंदोलन किस दिशा में जाएगा, ये काफी हद तक सरकार की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। ब्रसेल्स में भी फ्रांस से प्रेरित छोटे प्रदर्शन हुए हैं, यानी इसका असर पड़ोसी देशों तक दिख रहा है।

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