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West Bengal SIR क्या है? वोटर लिस्ट रिवीज़न का पूरा विवाद, आंकड़े और अब तक क्या हुआ – पूरी कहानी

New Delhi: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन समीक्षा (SIR) के बारे में बहस ने पिछले कुछ महीनों में राज्य की राजनीति में बहुत हलचल मचा दी। लगभग 90 लाख नामों की कटौती, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद, और चुनाव के नतीजों पर असर होना — सब

West Bengal SIR क्या है? पूरा विवाद और सच्चाई

 New Delhi: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन समीक्षा (SIR) के बारे में बहस ने पिछले कुछ महीनों में राज्य की राजनीति में बहुत हलचल मचा दी। लगभग 90 लाख नामों की कटौती, सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद, और चुनाव के नतीजों पर असर होना — सब कुछ इतना जटिल हो गया कि समझना आसान नहीं। तो चलिए, शुरुआत से समझते हैं कि असल में क्या हुआ।

West Bengal SIR क्या है?

SIR यानी विशेष गहन समीक्षा, एक प्रक्रिया है जिसमें मतदाता सूचियों की गहराई से जांच होती है। चुनाव आयोग इसे समय-समय पर चलाता है। इसका मकसद होता है नकली, डुप्लीकेट, मृत या स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं के नाम सूची से हटाना। बंगाल में यह पहली बार ऐसे बड़े पैमाने पर हुआ था, इसलिए इसका असर भी बड़ा रहा।

कब शुरू हुई, कैसे चली

बंगाल में SIR की शुरुआत बूथ लेवल ऑफिसर्स (BLOs) के घर-घर जाकर सत्यापन से हुई, जो 4 नवंबर से 4 दिसंबर तक चला। इस दौरान चुनाव आयोग ने राज्य पुलिस से BLOs की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा, क्योंकि जमीनी स्तर पर तनाव बढ़ता जा रहा था।

दिसंबर 2025 तक आंकड़े सामने आने लगे — करीब 15.53 लाख मृत मतदाताओं के नाम चिन्हित किए गए। इसके अलावा 2002 की पुरानी वोटर लिस्ट में गड़बड़ियां मिलीं — 85 लाख से ज्यादा मतदाताओं के पिता के नाम गलत या असंगत पाए गए, जबकि 24 लाख से ज्यादा मामलों में एक ही परिवार में छह से अधिक बच्चों की एंट्री दर्ज मिली — यानी डेटा में गंभीर विसंगतियां थीं।

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सबसे ज्यादा विवाद की बात कौन सी रही

अंतिम आंकड़ा आते-आते बात करीब 90 लाख नामों की कटौती तक पहुंच गई — जो अब तक की सबसे बड़ी SIR कार्रवाइयों में से एक मानी जा रही है। तुलना के लिए, 2024 में आंध्र प्रदेश में 18.6 लाख, महाराष्ट्र में 21.5 लाख, हरियाणा में 5.8 लाख और ओडिशा में 9.4 लाख नाम हटाए गए थे — यानी बंगाल का आंकड़ा इन सबसे कहीं ज्यादा बड़ा था।

भाजपा और TMC आमने-सामने

भाजपा ने इस पूरी कवायद को “पारदर्शिता की दिशा में जरूरी कदम” बताया और चुनाव आयोग के “सक्रिय रुख” की तारीफ की। भाजपा नेता अमित मालवीय ने तो यहां तक दावा किया कि SIR के लिए जमा किए गए कई दस्तावेज गैरकानूनी तरीके से हासिल किए गए और पूरी तरह अवैध हैं, और आयोग से इसकी जांच की मांग की।

दूसरी ओर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की TMC ने इसे “राजनीति से प्रेरित रिवीजन” कहा, आरोप लगाया कि यह अल्पसंख्यकों और हाशिए के समुदायों को मतदाता सूची से बाहर करने की कोशिश है। ममता बनर्जी ने खुद कोलकाता में एक रैली की अगुवाई कर इसका विरोध जताया।

“27 लाख लोगों के साथ अन्याय”  विश्लेषकों की चिंता

राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने एक बड़ा आरोप लगाया — उनके मुताबिक करीब 27 लाख लोगों को गलत तरीके से वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया, और आखिरी समय में हुए ज्यादातर सुधार बेअसर साबित होंगे। यह टिप्पणी उस वक्त आई जब मतदान नजदीक आते-आते भी वोटर लिस्ट में बदलाव जारी थे, जिससे प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठे।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

विवाद इतना बड़ा हो गया कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा किए गए SIR को कानूनी रूप से वैध ठहराया — यानी अदालत ने प्रक्रिया पर मुहर लगा दी, भले ही राजनीतिक विवाद खत्म नहीं हुआ। इससे पहले TMC समेत कई दलों ने आरोप लगाया था कि रिवीज़न के दौरान कई असली मतदाताओं के नाम अनुचित तरीके से हटाए गए।

विवाद चुनाव के बाद भी नहीं थमा

SIR का असर सिर्फ वोटर लिस्ट तक सीमित नहीं रहा — 2026 विधानसभा चुनाव के दौरान और बाद में भी विवाद जारी रहे। फाल्टा सीट पर तो EVM से छेड़छाड़ की शिकायतों के बाद पूरी तरह दोबारा मतदान तक कराना पड़ा। कई भाजपा समर्थकों, खासकर गांवों की महिलाओं ने स्थानीय TMC कार्यकर्ताओं से धमकियां मिलने का आरोप भी लगाया।

विवाद सुलझाने के लिए क्या इंतजाम हुए

शिकायतों से निपटने के लिए चुनाव आयोग ने 23 जिलों में 19 ट्रिब्यूनल बनाए, जिनमें से हर एक की अध्यक्षता एक रिटायर्ड जज कर रहे थे। मार्च 2026 तक करीब 37 लाख नामों के मामलों का निपटारा हो चुका था, और मतदाताओं को अपने EPIC नंबर से लिस्ट में नाम चेक करने की सुविधा भी दी गई।

आखिर में सीखने लायक बात क्या है

पश्चिम बंगाल के SIR की कहानी बताती है कि “साफ-सुथरी वोटर लिस्ट” जैसा प्रशासनिक काम भी कैसे गहरे राजनीतिक टकराव में बदल सकता है — खासकर तब, जब चुनाव नजदीक हों और आंकड़े इतने बड़े हों। सुप्रीम कोर्ट की मुहर के बावजूद, यह बहस अभी पूरी तरह थमी नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1: SIR क्या है?

मतदाता सूचियों की एक गहन समीक्षा प्रक्रिया, जिसमें डुप्लीकेट, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं।

Q2: बंगाल में कितने नाम हटाए गए?

करीब 90 लाख, जो अब तक के सबसे बड़े SIR ऑपरेशनों में से एक है।

Q3: सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

मई 2026 में कोर्ट ने चुनाव आयोग द्वारा की गई SIR प्रक्रिया को कानूनी रूप से वैध ठहराया।

Q4: TMC का मुख्य आरोप क्या है?

कि यह प्रक्रिया राजनीति से प्रेरित है और अल्पसंख्यकों व हाशिए के समुदायों को निशाना बनाती है।

Q5: विवाद सुलझाने के लिए क्या व्यवस्था की गई?

23 जिलों में 19 ट्रिब्यूनल बनाए गए, जिनकी अध्यक्षता रिटायर्ड जज कर रहे थे, ताकि शिकायतों का निपटारा हो सके।

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